उफ़
कितना अंधेरा है आज
चांद भी है
सूरज भी है
तारे भी टिमटिमा रहे हैं
फिर
क्या हुआ ऐसा
जो अपनी परछाई भी खो गयी
शायद कोई अपना खो गया
या फिर नेह सो गया
नहीं
अपने तो हैं
पर अपनापन न जाने कहां गुम हो गया
पर नेह
यह क्या है
अब तो यह भी याद नहीं
शायद बख्त की बेवफ़ाई है यह
तभी तो
जिन्दगी डूबती जा रही है
कुछ दर्द में
आहों में
कराहों में
अरमानों की जलती चिता देख
ख्वाबों सी टूटती हकीकत को देख
दिल डूबता जा रहा है
शरीर है
तो बस
एक बेजान बुत
कुछ जख्म ऐसे भी होते हैं
जो न
रिसते हैं
और न दिखते हैं
पर दर्द भरपूर देते हैं
पर
इस सभी के लिए दोषी कौन है
जिन्दगी
किस्मत
दुनिया
नहीं नहीं
इस सब के लिए
दोषी मैं ही तो हूं
फिर दर्द किसी और को
कैसे ?
देवयानी भारद्वाज

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