मुझे आज भी याद है जब हम बिछड़े थे,
तो तेरी जुदाई के दर्द बनके अश्क मेरी आँखों से निकले थे।
जाते जाते तुमने पीछे मुड़कर भी देखा था,
पर हम चाहकर भी पीछे न मुड़े थे।
मालूम था हमको इन राहों की कोई मंजिल न मुक्तसर है,
फिर इन राहों पर हम क्यों चले थे।
कभी कभी जिंदगी भी ऐसे दोराहे पर ला देती हैं,
रूह उनके साथ हो गयी रुखसत हम बस जिस्म से यहीं रहे थे।
बहुत सोंचा दे दूं तुम्हे वो मोहब्बत से भरे अफसाने ,
जो कभी तेरी चाहतों की स्याही से हमने लिखे थे।
चाहकर भी हम यह जुर्रत न कर पाए,
दिल ने बहुत कहा पर वो खत न तुम्हे दे सके थे।
आज भी मेरे पास खतों में लिखे हैं वो लम्हें,
जो कभी साथ साथ हमने जिए थे।
न हम ही वेबफा हुए तुम्हारी नजरों में,
यह अजब है ,न तुम ही वे बफा होके बिछड़े थे।
दोनों ने समझौता कर लिए मसलों से,
पर भीगीं थीं पलके जब अलग हुए वो वेनाम रिश्ते थे।
ले जाओ यह आखिरी लिखा खत मेरा,और दर्द का एहसास
करना,जब पढ़ो खोलकर ,जहां मिटे हो शब्द स्याही के।
समझ लेना हम तुमसे जुदा होकर किस तरह,
कितना तड़पे,कितना बिखर बिखर के सिसके थे।
कहने को वो अलविदा कहा था हमने तुमसे ,
उस लड़खड़ाती आवाज में मेरे दिल के टुकड़े थे।
बहुत पाक थी मासूम, थी मोहब्बत मेरी अंजुम,
एहसास करके रोया जार जार वो आखिरी अफसाने जब पढ़े थे।
उसके कहे आखिरी अल्फाज है आयत की तरह अजीज मुझे,
आज भी खुशबू महके हैं उसके आखिरी खत में जो जज्बे लिख्खे थे।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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