श्रद्ध तरंग की सुगंध बिखरते,
वसंत से मनोरम अहसास हो तुम।
बसते हो कहीं,बहते हो कहीं,
जीवन की प्रेम भरी पुकार में,
हर क्षण हरपल साथ तुम्हारा हो...
छंद - नृत्य- संगीत के क्षण में,
भीतर बहते अनुराग हो तुम,
उत्सव मनाती भोर किरण सम,
हर दिन की नयी शुरुआत में,
हर क्षण हर पल साथ तुम्हारा हो...
शांत नीरव गगन पर जैसे,
सौरभ लुटाती स्वर्णाभ हो तुम,
स्मृति की पगडंडी पर छुपकर,
उतरी मौन पदचाप में,
हर क्षण हर पल साथ तुम्हारा हो...
सागर में अस्तित्व मिलाने को आतुर,
इस बूंद का अरमान हो तुम।
तुम्हीं से तुम्हीं तुम घटते हो,
अनुग्रह के इन अहसास में,
हर क्षण हर पल साथ तुम्हारा हो.....
**********
मीनाक्षी कुमावत'मीरा'
रोहिड़ा (पिंडवाड़ा)
माउन्ट आबू,राजस्थान

0 टिप्पणियाँ