"गुलाब की पंखुड़ियों को सभी चाहते हैं, 
मैं गुलाब को इस तरह अपना लेती हूँ।
कांटों के साथ ही गुलाब को, 
अपने बालों में सज़ा लेती हूँ मैं।।

जब दर्द से आंखें छलकने को होती हैं,
मुस्कान को होंठों पर सज़ा लेती हूँ,
दर्द को अपने सीने में छूपा लेती हूँ मैं।

जब भी संघर्ष पथ पर जख्म मिलता है
जख्म के रक्त से माथे पर चंदन सज़ा लेती हूं।
हार कर भी विश्वास का लौ जला लेती हूँ मैं।

जब भी मन उदास या निराश होता है।
खुद ही खुद को चुनौती कर देती हूँ ।
चट्टान से टकराने का संकल्प उठा लेती हूँ।
कांटों के साथ ही गुलाब को अपना लेती हूँ मैं।।"
                                   अम्बिका झा ✍️