रावण का किरदार निभाना कितना मुश्किल होता है
कोई मेरे दिल से पूछे टीवी पर दूरदर्शन में राम , रावण संवाद पिछले दो हफ्तों से देख रहा हूं ! सोचा आज लिख ही दूं ?
क्योंकि हम जिस किरदार में अपनी भूमिका निभाते हैं ! और निभाते वक्त उसी में पूर्ण रूप से ढालना पड़ता है ! लेकिन सब किरदार निभा सकता हूं दोस्तों ! किंतु रावण का किरदार निभाना मुश्किल होता है ! एक और मंदोदरी समझा- समझा कर रावण को अंदर ही अंदर तोड़ देती है ! मानो रावण श्री राम की शरण में जाने को 10% निश्चय कर ही लिया हो !
मन में , लेकिन दुनिया क्या कहेगी... इतिहास क्या... कहेगा है ! इसलिए मन को मार कर जबरन बाहर से मिथ्या भाव दिखाना ही पड़ता है ! रावण का किरदार निभाना ही पड़ता है ! जब छोटा भाई विभीषण, नियति ,नियम राजा का उत्तरदायित्व इस प्रकार विस्तारित करके प्रेम पूर्वक वर्णन करता है !
जिससे कि बड़े से बड़ा पत्थर भी मोम सा पिघल जाए ? फिर भी अंदर ही अंदर मन व्याकुल होकर रावण का श्री राम की शरण में जाना रावण तय आखिर कर लेता है ! लेकिन फिर दर्शक क्या कहेंगे ..? रामायण बनाने वाले प्रेम सागर शायद क्रोध सागर में बदलकर रावण को ही बदल देते..? इसलिए रावण का किरदार निभाना पड़ता है !
बात तो जब और गहरी हो गई जब अतिकाय, अक्षकुमार, बालि, कुंभकरण आदि बलवान योद्धा मारे जाते हैं ! जिनको मारना असंभव था ? उस समय रावण का मन ही मन 20% दिल पसीजा उसने फिर तय किया श्री राम की शरण में जाऊंगा.. लेकिन फिर वही शायद दुनिया में अनोखा रावण होगा ...जो श्री राम की शरण में जाकर पूरी रावण के अभिनय की ऐसी तैसी करेगा शायद अमरीश पुरी ( अमरीश पुरी विलेन ) जैसा महान विलेन आख़िर कैसे झुका शायद देश के वैज्ञानिक भी हैरान होते... और आज तक खोज करते रहते ...
फिर जैसे-तैसे कुछ रावण का किरदार निभाते निभाते मेघनाथ राम लक्ष्मण युद्ध की बारी आई मेघनाथ ने पहली बार राम लक्ष्मण को नागपाश में बांध कर पहली खुशी मन ही मन रावण को दिलाई और बाहर से मुस्कुराहट कर रावण का किरदार निभाना कुछ रावण को अंदर ही अंदर अच्छा लगा कम से कम कोई पल तो आया अट्ठाहस करने का ..दो-तीन दिन बाद में लक्ष्मण शक्ति प्रहार करके मन ही मन रावण को साहस बांधा दिल खुश करा दिया रावण फूला नहीं समाया अंदर ही अंदर दिलमें मन ही मन रावण अभिनय में दिलचस्पी लेने लगा !
लेकिन जब लक्ष्मण की संजीवनी अमरता देख रावण की खुशी का पारा आखिर उतरा रावण का किरदार निभाने का मन नहीं किया.. माना एकदम उसका मन बदल गया और बात तो तब हो गई जब रावण को मेघनाथ समझाने लगा ...श्रीराम नर नारायण है उन पर ब्रह्मास्त्र , पशुपतिनाथ अस्त्र , आदि बेकार मानो उनके सामने सारे अस्त्र दिव्यास्त्र फटाका जैसे निकले ...मन ही मन रावण कहने लगा... कि मैं रामायण में रावण का किरदार क्यों ले लिया ? ,
, अरे पागल रामायण में सुग्रीव ,बहेलिया, बालि आदि बहुत से किरदार ले सकते थे ! लेकिन क्यों तू ने रावण का किरदार निभाया , सारे दर्शक फिर अंत में रावण की उपाधि देकर वास्तविकता में रावण कहकर संबोधित करेगे ..और करेंगे ..तेरी सारी गर्जना , तेरा सारा प्यार , एक राक्षस अभिनय निभाने में निकल जाता, मन ही मन रावण का किरदार , अपने अंदर ही अंदर ,कोसता ? फिर मन को मारकर , मजबूरन रावण का किरदार निभाना ही पड़ेगा ।
वास्तविकता में रावण ने अपने सारे कुल का उधार प्रभु श्री राम एवं लक्ष्मण के हाथों करवाया रावण वेद उपनिषद का अखंड विद्वान पंडित का ज्ञान एवं विश्व विजय जिस काल को तक अपने पैरों तले बांध रखा था...
जय राम जी की...
रावण की उपाधि कैसी लगी .रामायण में रावण का किरदार व्यंग भावना आपको कैसी लगी... वक्त निकालकर ..आपकी प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं ..कुछ और व्यंग्य लिखने के लिए प्रयास करूंगा जी धन्यवाद ? 🙏
✍️लक्ष्मीनारायण ठाकुर

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