हां कुछ बातों को लेकर हो जाता है अक्सर मन बेचैन मेरा,
जब किसी अवोध को देखती व्याकुल तो मन हो जाता बेचैन मेरा।
जब कभी भी देखती हूं किसी नारी पर होते अत्याचार ,
हां तो उसे बचाने के लिए हो जाता है मन बेचैन मेरा।
जब देखते हो किसी असहाय पर किसी दबंग का जुल्म होते ,
तो उसके लिए आवाज उठाने को हो जाता है मन बेचैन मेरा ।
जब कभी देखती हूं किसी बुजुर्ग को असहाय,
तो उनका सहारा बनने के लिए हो जाता है मन बेचैन मेरा।
जब कभी मन के कुछ भाव अधरों के देहरी पर ठिठक जाते हैं,
तो उनको कहने के लिए मन हो जाता है बेचैन मेरा।
लहू और सम्बन्ध के सम्बन्धों से परे हटकर,
कुछ अनकहे रिश्ते निभाने को हो जाता है मन बेचैन मेरा।
जो साथ हैं उनको साथ लेकर चलते हुए,
बहुत दूर अनजान एहसास जीने के लिए मन हो जाता बेचैन मेरा।
कभी तेज चलती हुई पुरवाई के साथ ,
बनके बयार उड़ जाने को मन हो जाता बेचैन मेरा।
जानती हूँ गलती मेरी जरा भी नहीं अंजुम,फिर भी झुक जाती,
रिश्तों के टूटने से बचाने के लिए हो जाता मन बेचैन मेरा।
कुछ अधूरे ख्वाब जिनको पाना मुनासिब नहीं,
उन ख्वाबों को हकीकत करने के लिए हो जाता मन बेचैन मेरा।
जब वो बनाके मासूम से चेहरा कहते अब मान भी जाओ न,
उनकी उस अदा पर 100 खून माफ करने को हो जाता मन बेचैन मेरा
जमाने के साथ रहकर जमाने की परम्पराओ का निर्वहन करके,
कभी लीक से अलग हटकर चलने को हो जाता मन बेचैन मेरा।
कभी किसी सही और गलत को जाति धर्म से न जोड़कर,
जो सच है उस सच को उजागर करने को मन हो जाता बेचैन मेरा।
कभी जानते हुए की वो अभिलाषा क्षणिक ही सुखद है,
उस तनिक सुख को जीने के लिए मन बेचैन हो जाता है मेरा।
अगर यह सब करके बेचैन होना गुनाह हैं तो मै बे झिझक कहती,
यह सारे गुनाह करने को हो जाता मन बेचैन मेरा।
अंजू दीक्षित
बदायूँ ,उत्तर प्रदेश

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