मैं और मेरा एकांत,
कुछ इस तरह हैं!!
जैसे तुम संग मैं,
तुम्हारे साथ को जीती,
तुम्हारे प्यार में रहती!!
रोज करती जी भर,
बातें तुझसे!
तेरे सानिध्य को महसूस,
करती!!
पुस की ठिठुरती,
ठंड हो, या हो,
जेठ की दोपहरी!!
हर क्षण रहते हो,
जाना तुम संग, मेरी!!
तुम संग हँसना,
तुम संग रोना!
तुम संग ही मुझको,
अब प्रीत निभाना!!
श्वेता कर्ण

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