यह कैसी बेचैनी है
छटपटाहट है ।

दिमाग जैसे जकड़ गया है
दिल जैसे सिकुड़ गया है ।

सोच पर घुन लग गया है 
अजीब सी धुन सवार है ।

कुछ है, जिसकी चाहत है
कुछ है, जिससे मन आहत है ।

सिमट रहा है आसमां
ज़मीं में भी दरार है ।

क्यों सब लगते बेगाने हैं
रिश्ते तो इनसे पुराने हैं ।

कशमकश चल रही है
असमंजस की स्थिति बढ़ रही है ।

चारों तरफ छाया अंधकार है
थोड़ी सी रोशनी की दरकार है ।

लेखनी विमुख है
विचार भी गुम है ।

काश कुछ ऐसा हो
पर क्या हो, यह भी तो पता हो ।

जीवन उदासीन लगता है
ना रात ना दिन कटता है ।

एक अंधकूप है
जहां न कहीं धूप है ।

हल्का सा हवा का एक झोंका
जो दे जीवन को एक मौका ।

रोशनी की एक किरण
नजर आए किसी तरफ ।

दरवाजा ना सही खिड़की ही खुले
काली रेत जहां से बाहर उड़े ।


                      धनु दयाल