स्वर्णिम भवन कलश कंगूरा
सौन चिरैया जामै रहती
उजड़ौ बिखरौ चमन आज वो
माता जामैं आहें भरती ।
उठैं श्याम घन खण्ड क्षितिज सौं
ज्यों सेना दसमुख की आई ,
मेघनाद सम दारुण स्वर सुनि
अवनी थर थर है थर्राई ,
मिल्यौ बन्धु जा आज शत्रु सौं
पग पग मर्म रह्यौ दिखराई ,
भई अहिंसा मूंक आज
हिंसा ताण्डव नर्तन है करती ॥
रावण भूख गरीबी घन कौ
राज आज पुरजोर पै आयौ ,
सठता कुम्भकरण नै अपन्यौ
गौरव मुक्त कण्ठ सौं गायौ ,
मामा कपट नै कनक मृगा बनि
निज माया सौं जग चौंधायौ ,
क्षीणकाय दैवीय शक्ति
दानवी दमनु नित जिनकौ करतीं ॥
आसुरी चक्र चल रह्यौ निरन्तर
वेबस जामें पिसे जा रहे ,
रक्त बिन्दु सौं जग कूँ सींचैं
श्रमिक देव कंकाल ह्वै रहे ,
बनी समष्टि हेम कौ गढ़
कंगूरा अवसान कह रहे ,
सदा सदा सौं अश्रु कोट के
बीच सदा लंका है बसती ॥
निर्दोषन की छाती पै
अन्याय कौ डंका निशदिन बजतौ ,
सत्य धरम सद्भाव न्याय कूँ
भूख दसानन पग पग कसतौ ,
लगी दीम सूर्पणखाँ जामै
राजद्रोह विषधर है डसतौ ,
अब अवसान निकट जामैं
संस्कृति सीता आहैं है भरती ॥
देवयानी भारद्वाज
उसायनी फीरोजाबाद

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