दूर रहकर पास हो तुम,
रेशमी एहसास हो तुम!
प्यास रेगिस्तान की मैं,
तृप्ति का आभास हो तुम!!
अंग लगते छंद जैसे,
गीत का विन्यास हो तुम!
जेठ की दोपहर सी मैं,
और सावन मास हो तुम!!
दिल बस तुझे ही महसूस,
करना चाहे, ऐसा एहसास हो तुम!
रूह से रूह का रिश्ता अटुट अब,
मेरे मन मंदिर के " देव " हो तुम!!
दूर रहकर पास हो तुम,
रेशमी एहसास हो तुम!
प्यास रेगिस्तान की मैं,
तृप्ति का आभास हो तुम!!
अंग लगते छंद जैसे,
गीत का विन्यास हो तुम!
जेठ की दोपहर सी मैं,
और सावन मास हो तुम!!
दिल बस तुझे ही महसूस,
करना चाहे, ऐसा एहसास हो तुम!
रूह से रूह का रिश्ता अटुट अब,
मेरे मन मंदिर के " देव " हो तुम!!
श्वेता कर्ण

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