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        ::एक कविता बिहार से::




थोड़ा सा पानी और मुठ्ठी 
भर रेत रख लो🌴
धान, गेहूँ सरसों और हरे
हरे खेत रख लो। 
रख लो एक बैल भईया 
हल से बाधं के🌴
दुआरे पर गाय खडी़ हो
खाए आटा सान के। 
जो पूछेगा तो उसको
बताएगें🌴
आने वाली पीढियों को
चल के बताएगें। 
कि दुनिया ऐसे हुआ
करती थी। 
स्कूल के पीछे वाला अमरूद
का वो पेड़ रख लो🌴
पोखर के पीड़ खड़ा वो खट्टे 
मीठें बेर रख लो।
एक दो बगिया रख लो बगिया
में फूल रे🌴
तितलियाँ में भोरे जहाँ खेलें 
आपस में मिलजुल रे। 
माटी चूल्हा रख लो फूस की
चूहानी रे🌴
मिट्टी एक  घडे़ में ठंडा ठंडा
पानी रे। 
बैठ के जमीन जहाँ हो 
खाने की छूट रे🌴
तावे गर्म गर्म रोटी ले
लूट रे। 
दादी नानी के खिस्से बाबा 
की डांट रखना🌴
आंगन में लगने वाली बुढिया
की खाट रखना। 
सोफे तुम लाख बिछा लो 
बाबा की चौकीं रखना🌴
उस पर एक बिछौना बिछाकर
लौटा और पानी रखना। 
वहाँ एक लालटेन रखना🌴
लालटेन में तेल रे।
रात जहाँ करे चांदनी रौशनी
से खेल रे🌴
गाँव में इक मेला रखना सर्कस 
और खेला रखना। 
चाट,पकौड़ी का एक दो
ठेला रखना🌴
रखना एक झालमूडी़ का
मर्चा तूफानी रे। 
गुपचुप में पीने वाला इमली
का पानी रे🌴
होली के रंग बचा लो,दीवाली
के दीप रे। 
भोर की अजांनें रखना🌴
छठ वाले के गीत रे। 
भूल न अपने लोक त्योहार रे🌴
अपने पुरखों से मिले तीज
त्योहार रे🌴
सबको बताएगें हम, ऐसी हुआ
करती थी दुनियाँ ।🌴🌴





                     🌴मनु✍🏻