लब्जों से होते हैं
ना जाने कई वादे
पढ़ सकते हो तो पढ़ो
निगाहों की बातें
लब्ज को रहना है मौन
पर निगाहों को करनी है
तुमसे हजारों बातें
ओझल क्यों हो
तरस रही है देखो आंखें
शांत है हम पर
मन में तो है तुम्हारे
लिए हजारों बातें
बोले या अब ना ही
बोले गुजर जाती है
सोचने में रातें
निगाहें तो दिखती है शांत
पर शैलाब से होती है
अकेले में हमारी मुलाक़ातें
पढ़ सकते हो तो पढ़ो
निगाहों की बातें
लब्जों से तो होते हैं
ना जाने कितनी झूठी बातें।।

        प्रिया ✍️❤️