जज़्बात को दिल में छुपा कर रखा है
टूटे दिल का हर टुकड़ा सम्हाल रखा है।
बैठती हूं जब भी तन्हाई में अकेले।
देखती हूं तस्वीर दिल में छूपा रखा है।
जब भी तुम सामने होते मुस्कुरा देती हूं।
क्योंकि ग़म दिल में महफूज रखा है।
खामोशियों को जीवन में उतार रखी हूं।
तेरे शब्दों का खंजर दिल के पार होता है
दिल में तो तुम हो ही तुम ही रहोगे सदा
दिमाग भी मैंने तुम्हारे नाम कर रखा है।
तुम्हारी बेरूखी से अब दर्द नहीं होता।
क्योंकि दिल को दर्द से आबाद रखा है।
तुम को सुकून है, औरों के चरचे में,
मैंने तुम्हें ही अपने दिल में बसा रखा है।
अब शिक़ायत नहीं है, तुम से कोई।
तेरी फितरत को दिल ने पहचान रखा है।।
अम्बिका झा ✍️

4 टिप्पणियाँ
तेरे दिए हुए हर दर्द को मैने इस तरह समेट रखा है,
जैसे अपनी बेशकीमती चीजों को संभाल कर रखते हैं।