गंगा के तट पर
विश्वनाथ की नगरी में
बड़ी सभा थी
महानुभावों की
वहाँ
एक महान तेजपुँज तपस्वी रुप
कर रहा था पथ प्रदर्शन
करा रहा था ईश दर्शन
तभी मैंने उसे
रोका
बीच से ही टोका
कहा मैंने
कौन हूँ मैं
उसने कहा
शुद्ध बुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा
मैंने पूछा
आत्मा क्या है
उसने कहा 
परमात्मा का अंश
प्रश्न की व्यत्पत्ति हुई
परमात्मा क्या है
जवाब था 
अखिल ब्रह्मांड नियन्ता
ब्रह्मांड क्या है
पंच महाभूतों से पोषित
प्रकृति
मैंने पूछा
प्रकृति क्या है
उत्तर मिला
वह तत्व जो भी पंचेन्द्रियों से दृष्टिगोचर होते हैं
मैंने पूछा
दृष्टि क्या है
दृष्टा के सहायक अवयव
तो फिर दृष्टा कौन है
आत्मा
और आत्मा 
परमात्मा
क्या अजीब श्रृंखला है 
प्रत्येक कड़ी आवद्ध है एक दूसरे से
बड़ी ही कोमलता से।

                      देवयानी भारद्वाज
                 उसायनी फीरोजाबाद