सेठ मंगल राम  बहुत बड़े व्यापारी थे ।
उनके पास पैसे और संसाधनों की कोई कमी नहीं थी।
वे बहुत मेहनती और दरिया दिल भी थे किंतु उनके अंदर एक कमी थी। जो लोग उनकी चापलूसी और खुशामद करते थे उनसे वह बहुत प्रसन्न रहते थे और उन्हें अक्सर कुछ न कुछ दिया करते थे जिससे लोग उनकी और तारीफ करते। वह अपनी तारीफ सुनकर गदगद हो जाते।
सेठ जी के बाग में एक माली था। उसका नाम गोपी था ।
गोपी सेठ जी के बाग की बहुत अच्छी तरह से देखभाल करता था। उसमें अच्छी अच्छी किस्म के फल, फूल के पौधे लगाता था ।  वह अपने काम से काम रखता  था ।
सेठ जी  जब बाग में  टहलने जाते थे तब  भी अपने काम में लगा रहता था ।
उसे डर था कि कहां वो और"  कहाँ वह और  ये मालिक लोग"। किस बात पर नाराज हो जाएं कोई ठिकाना नहीं।"
थोड़ी सी जगह पर उसने एक छोटा सा गड्ढा खोद रखा था। गड्ढा पानी से भरा हुआ था। गड्ढे के आसपास भी उसने फूलों के पौधे लगा रखे थे। जिससे वह गड्ढा बहुत आकर्षक लगता था। सेठ जी कभी-कभी जब उन्हें समय मिलता तो वह अपने बाग की सैर करने जाया करते थे।
 एक दिन जब वह बाग की सैर के लिए गए तो उन्होंने देखा की गड्ढे में कुछ पशु आकर पानी पी रहे हैं उन्होंने उनको वहां से भगा दिया और आकर गोपी को डांटने लगे -"" तुम बाग का ध्यान नहीं रखते हो और बाहरी पशु आकर यहां पानी पीते हैं ''।
गोपी ने उत्तर  दिया -" "साहब बहुत गर्मी पड़ रही है यह पशु -पक्षी बेचारे प्यास की मारे बेहाल हो गए हैं। इनकी दशा देखकर मैं उन्हें  पानी पीने के लिए नहीं रोक पाता"। 
सेठ जी को बहुत बुरा लगा कि ये अदना सा माली  मेरा जवाब दे रहा है ।
उन्होंने उसी समय उसे काम से निकाल दिया । 
गोपी बेचारा रोता  गिड़गिड़ाता  रह गया । सेठ जी वहां से चले गए।
उसकी जगह पर उन्होंने एक नया माली नियुक्त किया जो सेठ जी की खूब चापलूसी करता था लेकिन काम चोरी बहुत करता था। सेठ जी इस माली से बहुत खुश रहते थे।
व्यापार की वयस्तता के कारण आज सेठ जी बहुत दिनों बाद बाग में आये थे।
उन्होंने देखा कि  की रौनक खत्म हो गई है। पेड़ पौधे पहले की तरह हरे भरे नहीं हैं, गड्ढे में पानी भी बहुत कम है  और बहुत गंदा लग रहा है।
सेठ जी ने नए माली बिसुन  से इसका कारण पूछा तो उसने कहा -" "मालिक मैं तो दिन रात काम में लगा रहता हूं। बाहरी जानवर आते हैं इधर पानी पीने के लिए उनको भी भगाता रहता हूं लेकिन लगता है कि यहां की  मिट्टी उपजाऊ नहीं है इसलिए पेड़ पौधे सूख रहे हैं।" "
"ये गड्ढा कैसे सुख गया'"?
"मालिक इतनी ज्यादा गर्मी जो पड़ रही है।"
उसने कहा।
सेठ जी को अब गोपी की याद आ रही थी,सोच रहे थे कि जब गोपी काम करता था तब भी  तो  यही मिट्टी थी।

एक दिन सेठ जी अपने दोस्त सुखचंद जी के यहां गए।  वहां उनके नौकर ने बताया कि सेठ जी अपने बाग में टहल रहे हैं । अतः  सेठ जी वहीं पर उनसे मिलने चले गए।
 उन्होंने देखा कि सेठ जी का बाग तो एकदम हरा भरा है। यहां कितने पक्षी चहचहा रहे हैं । कितना मनोरम वातावरण है ।
दोनों मित्र बातें करते-करते बाग में टहल रहे थे ।अचानक उनकी नजर एक गड्ढे की तरफ पड़ी जो उन्हें उनके बाग के गड्ढे की याद दिला रही थी।
उन्हें थोड़ा आश्चर्य हुआ और गोपी का चेहरा उनकी आंख के सामने घूम गया।
उन्होंने देखा कि वहां पर कई पशु पक्षी पानी पी रहे थे और आसपास खुश होकर घूम रहे थे । तभी उन्होंने देखा कि एक आदमी मिट्टी के बर्तन में थोड़े  दाने लेकर आया और पशु पक्षियों के सामने बिखेर दिया ।
"अरे यह तो गोपी है । उन्होंने उसे पहचान लिया।
सेठ सुख चंद जी ने कहा -" "कि यह है हमारा नया माली गोपी !"" यह बहुत मेहनती और ईमानदार है इसके आने से मेरे बाग की रौनक लौट आई ।इससे पहले का माली बिसुन  बहुत मक्कार और कामचोर था।
 केवल मीठी मीठी बातें ही करता था। अतः मैंने उसे काम से निकाल दिया।
 उन्होंने अपने मन में कहा कि अब वह मेरे बाग में आ गया है और बाग उजड़ रहा है। वो गड्ढा भी सुख गया है जो गोपी ने अपनी मेहनत से बनाया और सजाया था।
अब  उन्हें गोपी को निकालकर बहुत पछतावा हो रहा था।
उसी दिन से सेठ जी के व्यवहार में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया था। अब वे किसी की भी चापलूसी से खुश नहीं होते थे, जो वास्तव में जरूरतमंद होता था उसकी मदद करते थे जिससे उन्हें बहुत खुशी और आत्मसंतुष्टि मिलती थी।



स्नेहलता पाण्डेय "स्नेहिल"
नई दिल्ली