लूडो कहते ही आ जाता,
याद उन सुनहरे दिनों का।
जब तीनों बच्चे बैठ जाते,
खेलने वे खेल लूडो का ।।
तीनों जब बैठते खेलने,
एक स्थान खाली रह जाता।
तब मुझको खेलने बुलाते,
छोड़ काम सब तब मैं जाता।।
जब वे गोटी मारे मेरी,
खुशियों से फूले न समाते।
जब आती थी उनकी बारी,
मिन्नतें मुझसे करने लगते।।
जब मेरी गोटी के आगे,
उनमें दो की गोटी होती।
बोलते मारने मुझसे वे ,
एक दूसरे की ही गोटी ।।
जब मैं खेल जीतने लगता,
उनमें एक को हारना पड़ता।
कोई यदि उनमें से हारा,
मुझे बेईमान वह कहता ।।
मैं लूडो में कभी न जीता,
जानबूझकर उनसे हारा।
खुशी भरे चेहरे बच्चों का ,
देख खुशी से झूम उठता।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"

0 टिप्पणियाँ