धुंध आँखों में वो तस्वीर,धुधँली सी,
कर रही है,दूर कही उसे मुझसे!
वो साँवला ,सलोना सा  मुखडा,
वो आँखो की नमी , वो सवाल मुझसे!

दरख्त के वो हरे पत्ते,वो घनी छाँव ,
वो चैन वो सुकून वो भरी दुपहर!
आज सूख चुके ,उसी डाली पर,
जो करते थे,जीने की मनुहार मुझसे!

ये जीवन,की कुढन,वो बैमेल से रिश्ते,
जीने के तरीके ही ,बदल देते है!
न खुद जीते है,चैन से जिन्दगी अपनी,
वो सामने आ कर करते है ,बवाल मुझसे!

ठहरी आँखो मे,सवाल , गीले से,
मर्म ,आँखो के,कोर मे छुपी बूँदे!
लरजते ओठ ,खामोश,दबी सी चीखे,
जैसे ,कोई हिसाब,करते है  मुझसे!

कितने अपने है,कौन समझ पाया है,
सब अँधी ,दौड के पथ मे ,साथी है।
कई समझदार ,कई विरले मेरे अपने,
वही ,ज्जबात भरी ,बात खगांलते मुझमें!
     रीमा महेन्द्र ठाकुर (लेखिका)
   रानापुर -झाबुआ -मध्यप्रदेश
   भारत