छिपे  हुए  रहे  राज  कितने ,
इन समंदर की गहराइयों  में।
अनादिकाल  से   संजोये   हैं ,
अनगिनत रहस्य अपने गर्भ में ।।

हैं अमूल्य रत्न गर्भ में  इसके,
जीव जंतु  अनोखे कितने ही ।
पर्वत ,गुफा ,औ'  जलधाराएं ,
बड़वानल   ज्वालामुखी  भी ।।

हैं  सागर  वर्णित  पुराणों में,
लवण,इक्षुरस,घृत व सुरा के ।
दधि क्षीर और मीठे जल  के,
सप्त समुद्र इस सृष्टि में होते।।

सुना कि है समुद्र के अंतर  में ,
नागलोक और सप्तलोक भी।
यहाँ  नाग,  जलपरियां   होते,
होते   हैं   हाथी   घोड़े     भी।।



वह रहस्य बरमूडा त्रिभुज का,
कोई अब तक न समझ पाया ।
कारण  क्या अदृश्य  होने का,
उन विमान और जहाजों का ।।

वह स्वर्ग जैसा नगर द्वारका,
समंदर  के  तल में  है डूबा ।
वह टाइटानिक जहाज यहां,
चिर समाधि में है  वह  लेटा ।।


कितने नगर  और  सभ्यताएं,
हुए विलुप्त इस सागर तल में।
कितने  जहाज  हैं  डूब  गये,
ले  अकूत धनराशि अतल  में।।

है अमूल्य भंडार निक्षिप्त  यहाँ,
मोती  शंख, मणि  ,माणिक, मूंगे।
असंख्य जीव और लोक  हैं यहाँ,
इन   समंदर  की  गहराईयों  में ।।

-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती " दिवाकर "