कुछ समय पहले
जब भी कहीं जाए और कोई भिखारी आवाज दे रहा होता है ₹10 दे दो ₹10 दे दो, घर के पास रेड लाइट, लोकल मार्केट में निकलो सीधा आ करके कहते हैं ₹10 देना
और अब तो सीधा है ऐसे मिलते हैं जैसे मुझे एक मिला जूते खरीदने हैं पैसे दे दो ₹500
एक ने दुकान की तरफ इशारा करके कहा मुझे यह चीज दिला दो अरे! भैया यह क्या हो रहा है।
समय के साथ-साथ भिखारियों की भी मांग जो है बढ़ती जा रही है उनका स्टैंडर्ड बहुत हाई हो गया है।
आजकल नहीं हमेशा से ही ऐसा था।
कुछ चुनिंदा लोग उनकी मांगे पूरी कर के आसपास ऐसे देखते हैं जैसे वो टाटा बिरला है और हम सब कंगाल हैं
मदद करने का भाव नहीं होता एक गर्व होता है।
यह अच्छा है भैया तुम पहले अमाउंट सेट कर दो अरे!दान तो श्रद्धा समान होता है कोई कितना भी देः
90' मध्य का वह समय था जब 10 पैसे और 20 पैसे प्रयोग में आने बंद हो गए थे लेकिन हां 25 पैसे और 50 पैसे अभी भी चल रहे थे। 50 पैसे की तो एक पालक की झूठी आ जाती थी जिससे घर में सब्जी भी बन जाती थी और पालक का रायता और पराठे भी। 25 पैसे ले जाते थे तो टॉफीस मिल जाती थी।
अब हुआ यूं कि एक दिन हम सह परिवार जा रहे थे। बहुत बड़ा बस अड्डा था। हम खड़े थे हालांकि मैं तो शहर जगह सब बता सकती हूं पर शायद आप लोगों को इस से क्या करना है।
एक एक करके,अलग नंबर वाली बस बाहर निकल रही थी और मैं, मेरी छोटी बहन और सबसे छोटा मेरा भाई जो उस वक्त मुश्किल से चार पांच साल का रहा होगा, मम्मी पापा के साथ खड़े थे।
मेरे पापा जी की नजर, उनका ध्यान अपने बस नंबर पर टिका हुआ था कि कौन कौन सी बस आ रही हैं।
तभी वहां एक भिखारिन आई बाल तो उसके बिखरे हुए थे ,थोड़े सफेद ग्रे, कपड़े भी उसने मेले पहने थे। उसका चेहरा एकदम स्वस्थ सुंदर,
उसने मेरे पापा जी के सामने आकर उंगलियां मोड़े हुए अपना हाथ फैलाया और अजीब सा टेढ़ा मुंह बनाकर गिडगिडाते हुए कहा एऐ बाबू जी कुछ पैसे दे दो...
मैं तो कभी अपने पापा की तरफ और उस भिखारिन की तरफ ध्यान से देखे जा रही थी।
पापा जी बिल्कुल वैसे ही बस की तरफ नजर टिकाए जेब में हाथ डालते हैं ,उन्होंने सफेद पेंट पहन रखी थी मुझे आज भी याद है और उनके हाथ में एक सिक्का आया उन्होंने उस भिखारिन के हाथ पर रख दिया। पापा जी तो अपने काम में व्यस्त हैं। भिखारिन उस सिक्के को उलट-पुलट कर देखने लगी और मैं उस भिखारी को देख रही थी जैसे उसने देखा है तो पचास का सिक्का है उसने वह हाथ बढ़ाया मेरे भाई की तरफ शायद वह मेरे भाई के हाथ पर वह सिक्का रखने वाली थी लेकिन इससे पहले मेरे पापा जी का थप्पड़ उसे गाल पर पड़ा और वह धड़ाम से नीचे जमीन पर पड़ी उसका कटोरा एक तरफ और उसमें से कुछ सिक्के एक तरफ पड़े
पहले पहल तो लोगों को समझ नहीं आया कि हुआ क्या एकदम सभी का ध्यान उधर गया।
मेरे पापा जी ने बोलना शुरू कियाः
चेक काट दूं, तेरे नाम तनखा दे दो पूरी इस महीने की इतना ही गुरूर है तो कमा कर क्यों नहीं खाती क्यों आकर हाथ फैला है मेरे सामने।
मैं पुलिस में हूंँ कानूनी रूप से तुम्हारा भीख मांगना गलत है अभी तुम्हें सबको मैं जेल में डालता हूंँ।
पापा पुलिस वाले हैं तो वह उसी गेटअप में आकर उसे धमकाने लगे ना सिर्फ वह अपना कटोरा और सिक्के समेट करवा के, आसपास के भिखारी भी वहां से भाग गए
मम्मी ने मेरे पापा को ही शांत रहने के लिए कहा।
वहां खड़ा हुआ एक आदमी बोला कि जी सही किया। भाई साहब आपने बहुत अच्छा किया।
हम तो यहां रोज के आने वाले हैं और इस भिखारिन ने नाक में दम कर रखा था।
उसको ₹1 भी दे तो यह उल्टा उसको कहती थी ले जा मेरी तरफ से अपने बच्चों के लिए मिठाई
उल्टा सीधा बोलती है, बेज्जती कर दी है। कोई इसको पांच या ₹10 दे दे तो उसको दुआएं देने लगती है।
रोज जाने वाले जाने वाले लोग इससे बचते हैं।
एक दूसरे व्यक्ति न ने कहा किस की देखा देखी दूसरे भी ऐसा करने लगे और यह देखो कितनी भीड़ है कितने भिखारी हैं यहां किस किसको दे हम
हां मुझे पता है आप मुझसे बहुत सारे लोग कहेंगे कि भिखारियों की मदद करनी चाहिए उनको पैसा देना चाहिए सही बात है लेकिन जरा सोचिए किसी को पैसे देने से फ्री में कुछ दिनों से कभी उसका कोई भला नहीं होता।
यह तो वही बात है कि सरकार फ्री में खाना दे दे बिजली, पानी मुफ्त करदे तो उससे कुछ बदलने वाला नहीं है।
देश की व्यवस्था तब बदलेगी उसकी अर्थव्यवस्था तब मजबूत होगी जब अवसर पैदा किए जाएंगे रोजगार के।
लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाना चाहिए। समाज को शिक्षित करना चाहिए। जीवन यापन के लिए तो वह खुद ही कमा लेंगेः
इस घटना से यह भी देखना चाहिए कि इंसान को गुरूर समय देखकर ही व्यक्त करना होता है।
तो आप किसी दूसरे के सामने हाथ फैलाते हो फिर उसे ही अपना गुरुर दिखाते हो।
वंदना शर्मा

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