हर शाम सब होते है
पर तुम नहीं
पंछी लौट आते हैं नीड में
पत्ते भी थम जाते हैं
पर तुम नहीं आते 
दीप जला देती हूं
मंदिर में तुलसी पर
घूम आती हूं नुक्कड़
तक नुक्कड़ भी मेरे
साथ ही आ जाती है
पर तुम नहीं आते
हर शाम चाय का
पानी चढ़ाती हूं
फिर शाम से बातें
करती हूं चाय भी
चिढ़ाती है फिर
वहीं ख्याल आता है
कि तुम नहीं आते हो
हर शाम सब होते होते है
बस तुम नहीं होते हो


अर्चना जोशी
भोपाल मध्यप्रदेश