राजा ऋतुध्धज के पुत्र हुआ। घर घर उत्सव मनाया जा रहा था। राज्य का राजकुमार और भविष्य का राजा धरा पर आया है तो प्रजा के आनंद का कैसे बखान हो।

  " पुत्रवती को बधाइयाॅ।"

   महाराज ने महारानी मदालसा का स्वागत किया।पर खुद को पुत्रवती सुनकर रानी को कोई खुशी न हुई। भला यह भी क्या बात हुई। पुत्र को जन्म देना बधाई का क्या कारण हो सकता है। यह तो ईश्वर की सृष्टि का विकार है। स्त्री और पुरुष के संयोग से संतान उत्पन्न होती है। एक बार संपर्क के बाद पुरुष की कितनी भूमिका रहती है। पर सृष्टि यदि चलती है तो नारी से ही। फिर पुत्र को जन्म देना बधाई का तो विषय नहीं है। राजा के अल्प ज्ञान पर रानी हस दी। 

   " इस समय हसने का कारण...? महारानी, समझ नहीं आया।" 

   " कुछ भी तो नहीं।" मदालसा जानती थी कि महाराज समझने की स्थिति में नहीं हैं। फिर समझाने का व्यर्थ परिश्रम कौन करे। 

  " महाराज। एक स्त्री का कर्तव्य केवल संतान उत्पन्न करने तक नहीं होता है। संतान उत्पत्ति के बाद उसे संस्कारी बनाना भी आवश्यक है। माता ही संतान की प्रथम गुरु होती है।" 

  महारानी ने अपने संवाद में कहीं भी पुत्र शव्द का प्रयोग नहीं किया। पर महाराज इस गूढ बात को समझ न सके। शुद्धि के बाद पुत्र का नामकरण होना था। राज्य की प्रचलित परिपाटी के अनुसार महाराज ऋतुध्धज ने प्रजा के मध्य राजकुमार के नाम की घोषणा की। 

  " गति में इसके बराबर कौई नहीं होगा। इसलिये राज कुल का गौरव बढाते हुए राजकुमार का नाम विक्रांत होगा।" 

   प्रजा राजकुमार विक्रांत का नाम लेकर जय जरकार कर रही थी। इसी मध्य एक हसी गूंजी और सभी शांत हो गये। 

  ". महारानी। इस अवसर पर आपका यह हास्य। आप परम विदुषी हैं। कोई तो अर्थ है। "

" हाँ महाराज। निश्चित ही अर्थ है। पर अभी आपको समझा नहीं सकती। क्षमा करें। उचित समय आने पर आपको जरूर बताऊंगी।" महारानी मदालसा ने हाथ जोड़ लिये। 

   दिन बीते, महीने बीते, वर्ष भी बीते। पर महारानी के हास्य का कारण प्रगट करने का समय न हुआ। अब महारानी केवल माँ बन गयीं। दिन और रात पुत्र की देखभाल में लगी रहतीं। 


शुद्धोसि, बुद्धोसि, निरंजनोसि 
संसार माया परिवर्जितोसि 
(
तू ही शुद्ध है 
तू ही बुद्ध है 
संसार की माया 
छोड़ खुद से 
तू ही ईश्वर 
तू आजाद) 

  महारानी की लोरियों का अर्थ कोई समझ न पाता। पर जब राजकुमार बड़ा होने लगा तो संसार से अनासक्त होने लगा। हर प्राणी में ईश्वर को तलाशने लगा। गुरुओं को अपने प्रश्नों से चकित करने लगा। बहुत कम आयु से ईश्वर को ढूंढने लगा। खुद का रहस्य जानने लगा। फिर राजकुमार विक्रांत के राजा बनने से प्रजा का क्या भला होगा। महाराज और प्रजा चिंता सागर में डूबते कि उससे पूर्व उन्हें दूसरे पुत्र की प्राप्ति हुई। प्रजा के मध्य महाराज ने पुत्र का नाम सुबाहु रखा। फिर महारानी का हास्य गूंजा। फिर उचित समय का इंतजार। इंतजार पूर्ण न हुआ। पर माता मदालसा की लोरियों को सुनकर सुबाहु भी ब्रह्म ज्ञानी हो गया। 

  तीसरे पुत्र का नामकरण शत्रुमर्दन हुआ। फिर से महारानी मदालसा हंसी। शत्रुमर्दन अपने दोनों भाइयों से भी एक कदम आगे हुआ। 

   महारानी फिर से गर्भवती थी। पर महारानी ने अपने हसने का कारण अभी तक महाराज को नहीं बताया था। इस बार फिर से पुत्र हुआ। नामकरण का समय। प्रजा इंतजार कर रही थी। महाराज क्या नाम रखेंगे। पर महाराज तो शांत थे। 

  " स्वामी। पुत्र का नामकरण कीजिये।" मदालसा का आग्रह। पर महाराज निश्चल खड़े रहे। 

   " महारानी। तीनों बड़े पुत्रों के नामकरण के समय आप हंसी थीं। इस बार आप नामकरण कीजिये।" 

   " ठीक है महाराज। इनका नाम अलर्क होगा।" 

  प्रत्येक जीव में ईश्वर का दर्शन करने बाली मदालसा ने अपने पुत्र के लिये इसके शव्द के स्थान पर इनके शव्द का प्रयोग किया। 

" यह क्या नाम। अलर्क... ।क्या अर्थ है इस नाम का। " महाराज जोर से हंसने लगे। राजा और रानी की बातों पर प्रजा में प्रगट में कोई नहीं हसा पर कोई भी ऐसा न था जो मन ही मन न हसा हो। 

  " इसी तरह मैं भी हसी थी जब आप पुत्रों का कुछ भी नाम रख रहे थे।" 

  " महारानी। मेने बड़े पुत्रों के नाम सोच समझकर रखे थे। "

  " महाराज। आपकी सोच में और मेरी सोच में यही तो अंतर है। आप शरीर देखते हैं और मैं आत्मा को। गति, शारीरिक शक्ति तो शरीर के विकार होते हैं। आत्मा तो निर्विकार होती है। जिस आत्मा की कोई गति नहीं, वह विक्रांत किस तरह। जिस आत्मा की कोई बाहें नहीं, वह सुबाहु कैसे ।मित्र और शत्रु तो माया के कारण प्रतीत होते हैं। आत्मा का भला कौन मित्र और कौन शत्रु। 

   महाराज। संसारिक धर्म के निर्वाहन के लिये नाम बस एक पहचान होता है। न तो इसका आत्मा के गुणों से कोई संबंध है और न भविष्य के घटनाक्रम से। फिर अलर्क नाम भी बस एक पहचान है। "

" महारानी के ज्ञान की जय हो। यही सत्य है। वास्तव में आत्मा अजर और अमर है। निराकार वृह्म का रूप है। "

  सभा में उपस्थित ऋणिओं और ज्ञानियों ने रानी का समर्थन किया। चहुंओर रानी की जय जयकार हो रही थी। इसी मध्य महाराज ऋतुध्धज महारानी मदालसा के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

  ". महाराज ।यह अनुचित आचरण क्यों। मैं आपकी पत्नी हूं। मेरा धर्म आपको नमन करना है। "

  " नहीं महारानी। यह बात अल्पज्ञ लोगों के विषय में सत्य है। ज्ञानी चाहे स्त्री हो या पुरुष, पूज्य है।" 

  " पर महाराज। संसार में आने पर सांसारिक धर्म भी मानने होते हैं। सांसारिक धर्म तो यही है कि मैं आपकी पत्नी हूं। और आप मेरे पति। "

" महारानी। यही याचना कर रहा था। इस एक पुत्र को तो राज्य सम्हालने के काबिल बना दो। इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है। प्रजा का हित है। प्रजा को भावी नरेश चाहिये.. महारानी। "

   महाराज की विनय यथार्थ के नजदीक थी। प्रजा में भी अनेकों हाथ जोड़ प्रार्थना कर रहे थे। 

तू जीव था 
जग में आया 
कर्म राह पकड़े 
धर्म का राज्य 
प्रजा की अभिलाषा 
पूर्ण करे 
आसक्ति रहित हो
बरते कर्म में 
यही कर्म ज्ञान 
देते खुद ईश 
रच निज सृष्टि 
सूर्य नारायण को 

   महारानी मदालसा की लोरियों का स्वर बदला। राज्य को भविष्य का हौनहार राजा मिला। 

   महाराज और महारानी की आयु का तीसरा चरण। राजकुमार अलर्क का राज्याभिषेक हो रहा है। 

   " पुत्र। धर्म पूर्वक प्रजा की सेवा करना। कभी भी प्रमाद में न पड़ना। जब आपपर कोई कष्ट आये तभी इस पत्र को खोलना। इसमें वह दुर्लभ ज्ञान है जिसे किसी कारण से आपको दे नहीं पायी। पर यही यथार्थ ज्ञान है। एक न एक दिन आपको इसकी आवश्यकता होगी।" 

   महारानी ने पुत्र अलर्क को आशीर्वाद दिया। और पति के साथ राज्य त्याग वनों में चल दीं। वहीं बहुत काल तप पूर्ण जीवन जीकर राजा व रानी दिव्य लोकों को प्राप्त हुए । 

....... 

  " भाई ।अलर्क संसार में ऐसा फस गया है। आयु की इस अवस्था पर भी अभी तक मोह में बंधा है। उसे बंधनमुक्त करना चाहिये।" 

   सुबाहु और शत्रुमर्दन ने अपने बड़े भाई विक्रांत के समक्ष प्रस्ताव रखा। 

   तीनों भाइयों ने नगर पर चढाई कर दी। सैन्य बल के बहुत आगे होने पर भी अलर्क उनसे पार नहीं पा पा रहा था ।यही वृह्म तेज है। आखिर में उसे माता मदालसा के पत्र का ध्यान आया। पत्र खोला। वही लोरी जो रानी मदालसा ने अपने तीन पुत्रों को सुनाई थी, लिखी हुई थी। 

तू ही शुद्ध है 
तू ही बुद्ध है 
संसार की माया 
छोड़ खुद से 
तू ही ईश्वर 
तू आजाद

  अलर्क समझ न सका। बचपन में लोरी सुनते सुनते जिस ज्ञान को बड़े भाइयों ने अपने जीवन में आसानी से उतार लिया था, वह इतना गुह्य ज्ञान था जो कि आसानी से किसी की समझ में न आ सके। कहा भी जाता है कि बच्चों को बचपन से ही संस्कार दिये जाते हैं। 

   महाराज अलर्क उस पत्र को लेकर घूम रहे थे। कोई भी ऋषि और मुनि उसका अर्थ समझा नहीं पा रहा था। 

  " क्या इस धरा पर कोई है। जो मुझे माता जी के पत्र का अर्थ बता सके।" 

  राजा ने सभी से पूछा। 

" परम विदुषी महारानी मदालसा के ज्ञान के विषय में वही बता सकता है जिसने बचपन में उनसे यह ज्ञान लिया हो। और वह हैं आपके तीनों भाई।" 

  मुनियों ने समझाया। 

  " पर भाई तो इस समय शत्रु हैं। "

" महारानी मदालसा के विशिष्ट ज्ञान से ज्ञानी आपके भाई किसी के शत्रु नहीं हो सकते। "

   आखिर महाराज अलर्क बड़े भाइयों के पास गये। यही उनका उद्देश्य था। छोटी सी लोरी की विस्तृत व्याख्या हुई। महाराज अलर्क भी अपने युवा पुत्र को राज्य सौंप वृह्म की खोज में लग लिये। 

समाप्त.... 


दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'