अग्नि पथ हो चाहे जीवन,
या एहसासों की आंधी हो,
करती हूं संघर्ष सदा,
कभी भी मैं न हारी हूं।
हां मैं नारी हूं----
कोख में चाहे, बेटी मारो,
या अस्मत की लाचारी हो,
कितनी भी कठिन डगर हो मेरी,
चलने की तैयारी ,हूं।
कभी भी मैं न हारी हूं।
हां मैं नारी हूं-----
शक्ति स्वरूपा हूं फिर भी,
रिश्तों में बंध, फर्ज निभाती हूं।
देवी कहते, पर सम्मान कभी न पाती हूं।
हां मैं नारी हूं--------
संघर्षों से लिखी कहानी,
पीर छुपा मुस्काती हूं,
आधा जीवन पीहर, आधी ससुराल निभाती हूं।
टुकड़ों में बट जीती हूं मैं,
फिर भी कभी ना हारी हूं,
हां मैं नारी हूं-------
विजय लक्ष्मी शुक्ला

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