सुनो जी मुझे भी अंतरिक्ष पर जाना है।
देखने है नवग्रह, तारों से खेलकर कर आना है।
चाँद का झूला झुलुगी।
शुक्र ग्रह के छल्लो को हार बनाऊंगी ।
सूरज में गर्मी तुम्हारे गुस्से जैसी है ।
या तुम से कम यह महसूस करके आऊंगी।
बृहस्पति गृह से तुमको डांट लगवाऊंगी।
तब पता चलेगा तुमको बड़ों का स्वभाव।
जैसे मै झेलती रहती हमेशा तुम्हारा रूबाव ।
यहाँ तो वैसे भी करोना ने हाथ पैर फैला रखे है।
ऑक्सीजन भी ना बची है।
इससे तो अच्छा चाँद पर ही कुछ दिन रह आए।
जब सब ठीक हो जाए यहाँ पर फिर हम वापस आए।
क्या कहा ओ झल्ली पगली।
जाकर बसाएगी चाँद पर नगरी।
वहां ना जीने के साधन ।
ऑक्सीजन का ना पता वहां पर कितनी है।
यहाँ तो फिर भी सांस ले रही।
इन पेड़ों की बदौलत।
सारी दौलत धरी रह जाएगी।
इस मुफ्त की पेड़ो की मेहरबानी के आगे।
फिर भी कोई ना इस बात को समझे।
दिन रात जंगल काट रहे।
अब पता चल रही ऑक्सीजन की कीमत ।
जब हाथों में नोटों की गड्डी लिए घूम रहें
यहीं जमीन पर रहकर नये नये।
पेड़ पौधे लगाओ।
पृथ्वी से सुन्दर ना कोई गृह।
इस बात को तुम जान जाओ।
दूर के ढोल सुहावने होते।
ये बात सब जानते है।
दूर से ही चाँद सुखद लगें हैं।
इस बात को सब मानते है।
रही मेरे गुस्से की बात।
आगे से कम करने की कोशिश करूँगा।
ना जाने की अंतरिक्ष पर जरूरत।
यहीं से तारों को सुन्दर संसार दिखेगा।
नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया)🌹🌹
दिल्ली

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