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प्रतिशोध की ज्वाला स्वयं को जला देती है,
बुद्धि भ्रष्ट और घमंड को बढ़ा देती है,
इस ज्वाला में मन विचलित हो जाता है---
स्वयं की सुध बुध नहीं रहती---
मान सम्मान घट जाता है,
आंखों के आगे घनघोर घटा छा जाती है---
बदले की भावना ह्रदय को बड़ा जलाती है,
मन का तनाव बढ़ जाता है
बुद्धि विपरीत हो जाती है
सुख शांति जीवन की---
इस आग के पतंगे में बदल जाती है।
संगीता वर्मा✍✍

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