पलको पर उँगलियाँ फिराई मैने,
कुछ गरम सा ,हाथो को छू गया !
मै हतप्रभ हो गई,अचम्भित मूक,
तो क्या पाषाण पिघल गया ,किसी
कोने मे!!
ऐ रूक ,वेग सम्भाल तू ,अपना.
मोम न खुद को बनने देना,!
धागा जब तक लिपटा है ,तुझमे"
तब तक महफूज है,तेरे मिटते ही !
अपना अस्तितत्व खो देगा तुझमे,
चलो अच्छा है।
तोहमते भी लिखी होगी ,हाथ की ,
लकीरो मे, तो उन्है भी ,सुलझा लेगे!
न ऐसी कोई उलझन है,जो सुलझे ही
नही,हाथ पकडते है,छोडते नही,मर्जी ।
गलतफहमियों ,
की दीवार ,खडी करते कुछ ,चुनिदां ,
लोग,कान के कच्चे हो बात न समझते हो!
समझते ,हो बेगुनाहो ,को गुनाहगार,चापलूसो.
की संगत मे रहते हो,,आसपास फैला रखा है!
नागफनियों को """"
मासूमों का शिकार करते हो,।।
रीमा महेन्द्र ठाकुर
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश

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