बचपन में माँ मुझे सुलाती ।
साड़ी का वह परत बनाती,
वह मेरे सर के नीचे रखती।।
मुझे बड़ा आनंद मिलता था,
वह कोमल तकिया लगता था।
उसकी भीनी खुशबू पाता,
मीठी सपनों में खो जाता।।
कभी कभी माँ की साड़ी ले,
पलंग पर बिछाता चादर-सा।
कभी उसे ओढ़ूँ तो जैसे,
स्वप्नलोक में रहूँ विचरता ।।
कोमल तकिया मुझे न भाता,
ना मुलायम कंबल चादर भी।
माँ की साड़ी मुझको भाता ,
वह मेरा तकिया चादर भी।।
आज नहीं है माता मेरी,
बरसों पहले वह छोड़ गई।
मैंने उसकी साड़ी रख ली,
अलमारी में रखी आज भी।।
कभी याद जब माँ की आती,
उस साड़ी को मैं निहारता।
उसकी वही खुशबू आज भी,
मुझको सांत्वना दे जाता।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "

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