महेशजी -(पार्क में हाथ में अखबार लिये हुये मन ही मन सोच रहे हैं।) अरुंधति के विषय में क्या किया जाये? आज उससे बात कर कुछ  उपाय सोचना होगा। 
(इतने में अरुंधति रोहन को लेकर आती है।)
अरुंधति -नमस्ते जी!
महेश जी- (मलहम लगा हुआ और सूजा हुआ उसके हाथ को देखकर) आइये। अरे, ये आपके हाथ को क्या हुआ? कुछ दुर्घटना हो गई क्या?
अरुंधति - नहीं, कुछ नहीं, बस----
(उसके कुछ कहने के पहले रोहन बोल पड़ा।)
रोहन - दादी के ऊपर मेरी माँ ने गरम चाय फेंक दी।
अरुंधति - (तुरंत उसे चुप कराते हुए) रोहन ! जब बड़े लोग बात करते हैं तो बच्चे बोला नहीं करते। और हाँ,इन्हें दादाजी कहकर पुकारना । नमस्ते करो दादाजी को!
रोहन- नमस्ते दादाजी! 
महेशजी - जीते रहो बेटे! जाओ ,तुम और पिंकी खेलो।
महेश जी - क्यों अरुंधति जी! क्या बात हुई? आपके हाथ में फफोले पड़ गये हैं। क्या यह सच है कि आपकी बहू आपके ऊपर गरम चाय फेंक दी। आपने कुछ दवा ली कि नहीं?
  (अरुंधति फफक कर रो पड़ती है।)
(कु्छ देर बाद)
महेशजी - अरुंधति जी! जो हो रहा है,  बहुत गलत हो रहा है । क्या मैं आपकी बहू और बेटे पर पारिवारिक हिंसा का केस कर दूँ ? उनके होश ठिकाने आ जायेंगे।
अरुंधति- नहीं,नहीं !  कुछ नहीं ,्ये सब चलता रहता है।
महेशजी - नहीं अरुंधति जी! आप मुझे सारी बातें खुलकर कहिये।
अरुंधति - आप इतना पूछ रहे हैं तो मुझे बताना ही पड़ेगा।(उसका गला रुँध जाता है) जी, जब से  मेरे पति का देहांत हो गया ,तबसे मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूँ।  मेरा बेटा रामू और बहू अलका तरह तरह से मुझ पर अत्याचार कर रहे हैं। मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी । घर के सारे नौकरों को हटाकर मुझसे घर का सारा काम करवाते हैं। खाना बनाना, कपड़े धोना, घर की सफाई करना ,बर्तन धोना सभी काम करना पड़ता है। घर में एक छोटा सा कोठरी मुझे रहने के लिये दिया है। बहू के महिला मंडली के मित्र आते हैं तो उनके लिये चाय नाशता बनाना पड़ता है। इतना करने के बाद भी बहू मुझे गाली देती रहती है। बेटा उसके सुर में सुर मिलाता है और मुझे ही नसीहत देता है। कितने नाजों से पाला था उसे! सोचा मेरा बुढ़ापे का सहारा होगा!  अभी तो वह मुझे मेरा घर अपने नाम करने की रट लगाये हुए है। वह खुद एक वकील है ,उससे हम कैसे झगड़ा मोल लेंगे? पर आखिर मेरा बेटा है, मैं उसे दुख नहीं दे सकती। ( वह फफक फफककर रोने लगती है।)
महेशजी - मत रोइये अरुंधति जी! चलिए आपने सारी बातें बता दी। हम अवश्य कुछ करेंगे। आपने अपने बारे में बताया,अब मैं अपने  बारे में बताता हूँ ,सुनिए।
  जैसा पहले ही कहा था मैं वन विभाग में  वन संरक्षण अधिकारी के पद पर काम किया। मेरा यहाँ हाउसिंग बोर्ड के  एचआईजी कॉलनी में एक मकान है। फरीदाबाद में एक फार्महाउस है।मेरे पास धन दौलत सब कुछ है। मेरा बेटा अनिल और बहू सरला  मेरी सब बात मानते हैं । घर में शांति है। पर एक ही कमी है। वह यह कि घरवाली नहीं है। मेरी पत्नी मुझे छोड़कर पंद्रह साल पहले ही चली गई हैं। तब से यह वीरान जिंंदगी जी रहा हूँँ।
अरुंधति - ओह, तो आपने फिर से शादी क्यों नहीं की?
महेशजी- बस यूँ ही! वैसे ढंग की महिला नहीं मिली ,जो मेरे जीवनसंगिनी बन सके।
अरुंधति - आपको कैसी महिला चाहिए थी?
महेशजी - मुझे अच्छे संस्कारों वाली सुशील महिला की तलाश थी, जो मेरे और मेरे बेटे की देखभाल करे, पर वह आज तक नहीं मिली।
अरुंधति - ओह!
(इतने में पिंकी और रोहन चले आते हैं।)
महेशजी - अच्छा, अब चलते हैं। देखिये अब हम तो दोस्त बन गये न ? कल फिर मिलते हैं। (वे हँसते हुए कहते हैं।)
अरुंधति- जी, जरूर!(एक मधुर मुस्कान उसके चेहरे पर खिंच जाती है।)
महेशजी - अपना ख्याल रखियेगा!
अरुंधति - जी!
               (  शेष अगले भाग में)