लक्ष्य इंजीनियरिंग पढ़ने जर्मनी गया । पढ़ाई के बाद वहीं बर्लिन में मर्सिडीज कंपनी में उसे जॉब भी मिल गई । अपनी मां सविता जी को भी उसने बर्लिन में ही बुला
लिया । लक्ष्य और टीना साथ ही काम करते हैं । दोनों ने लव मैरिज की । टीना का जन्म बर्लिन मैं ही हुआ था । उसके पिता देव राय डॉक्टर हैं ।
सविता जी को बर्लिन आकर अच्छा लग रहा था । वे यहां की साफ सफाई से बहुत प्रभावित हुई । भारत की तरह यहां बिल्कुल भी भीड़ नहीं थी । उन्हें यहां पर सबसे अच्छी बात यह लगी कि सड़क पार करने के लिए ट्रैफिक सिग्नल के लाल होने का इंतजार नहीं करना पड़ता था । ट्रैफिक सिग्नल में एक बटन लगा होता था, जिसे भी सड़क पार करनी होती, वह बटन दबा देता और सारी गाड़ियां रुक
जाती । फिर वह व्यक्ति आराम से सड़क पार कर लेता
था ।
टीना अच्छी लड़की थी । सविता जी को उसका व्यवहार बहुत अच्छा लगा । टीना को बहू के रूप में पाकर वे बहुत खुश थी । छुट्टी के दिन टीना, सविता जी को बर्लिन के यूरोपा पार्क घुमाने ले गई । सविता जी को पार्क बहुत पसंद आया लेकिन भारत की तरह वहां पर ठेले, रेहड़ी पर खाने का सामान बेचने वाले नहीं थे । सविता जी को याद आया, जब वह लक्ष्य के साथ मेला देखने जाती थी तो लक्ष्य गोलगप्पे, टिक्की चटकारे ले - ले कर खाता था । उसके बाद भी उसका मन नहीं भरता था और आलू की चाट घर लेकर आता था ।
सविता जी को बर्लिन आए छः महीने ही बीते थे कि उन्हें भारत की याद आने लगी । वहां के लोगों का अपनापन, खाना, त्योंहार सब याद आने लगे । टीना और लक्ष्य सुबह ही नौकरी पर निकल जाते और रात आठ बजे तक आते । पूरे समय सविता जी अकेली रहती ।
लक्ष्य ने एक दिन सविता जी से पूछा, "मां क्या हुआ ? आपको यहां कोई परेशानी है ? हमसे कोई गलती हो गई ? आप मुझे पहले से कमजोर और उदास लगती हो ।"
सविता जी के होठों पर फीकी मुस्कान आ गई वे बोली,
"नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं । तुम लोगों से कोई गलती नहीं हुई है ।"
"तो फिर इतनी उदास क्यों हो ?" लक्ष्य ने सविता जी का हाथ सहलाते हुए कहा ।
सविता जी बोली, "बेटा, तुम दोनों के जाने के बाद मुझे बहुत अकेलापन लगता है । भारत में भी मैं अकेली ही थी । पर वहां पड़ोसी ही रिश्तेदार जैसे लगते हैं । दुख - सुख में हमेशा साथ खड़े नजर आते हैं । सारा दिन किसी न किसी का आना - जाना लगा रहता है । बच्चे भी दादी - चाची कहते, आसपास घूमते रहते हैं । पर यहां तो किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं है ।"
लक्ष्य बोला, "हां मां, आप ठीक कहती हैं । यहां यह बात तो है । हम दोनों में से कोई एक भी आपके पास रहे तो आपका मन लगा रहे ।"
"नहीं नहीं बेटा, मुझे तुम दोनों से कोई शिकायत नहीं । तुम आराम से अपनी नौकरी करो ।"
टीना यह सब सुन रही थी । वह बोली, "लक्ष्य, हम मां के लिए एक कुत्ता ले आते हैं । मां को फिर अकेलापन नहीं लगेगा ।"
सविता जी, टीना की बात सुन कर मुस्कुरा दी और सोचने लगी, टीना मेरी गोद में अपनी संतान देने के बजाय कुत्ता पालने की सोच रही है ।
लक्ष्य बोला, "मां, आप क्या कहती हैं, इस बारे में ?"
"नहीं बेटा, तुम रहने दो । मुझे कुत्ता नहीं चाहिए ।"
संडे को लक्ष्य ने बाहर घूमने का प्रोग्राम बनाया और सब चिड़ियाघर देखने गए ।
सविता जी बोली, "लक्ष्य, यहां गोलगप्पे नहीं मिलते क्या ? एक साल हो गया यहां आए हुए, गोलगप्पे नहीं खाए । तुम्हें तो बहुत पसंद है ना ।"
लक्ष्य, मां की बात सुनकर हंसते हुए बोला, "मां, यहां पर हमारे भारत जैसा खाने को कुछ भी नहीं मिलता । यहां तो उबला हुआ फीका सा खाना मिलता है । खाने के मामले में हमारा भारत बहुत अमीर है । वहां की तरह यहां चाट, पकोड़े, समोसे, ढोकला, डोसा, छोले भटूरे, पाव भाजी कुछ भी नहीं मिलेगा ।" यह कहते-कहते लक्ष्य के मुंह में पानी आने लगा ।
"मां, जब मैं जर्मनी आ रहा था, तब कई दिन पहले से ही आपने, मुझे तरह - तरह की मजेदार चीजें बनाकर खिलायी थी । उस दिन के बाद अब एक साल से आपके हाथ से बना अच्छा खाना खाया है । नहीं तो यहां मैं खाना - पीना ही भूल गया था ।"
यह कहते-कहते लक्ष्य उदास हो गया ।
उसे जर्मनी आए सात साल हो गए थे । पहले पढ़ाई और फिर नौकरी, इन सब में यह सब कहीं पीछे ही छूट गया
था । लक्ष्य का अब घूमने में मन नहीं लग रहा था । घर आकर भी वह भारत में अपनी उन गलियों में घूम रहा था, जब वह मां से जिद करके दस रुपए की भेलपुरी लेकर खाता था । भेलपुरी का स्वाद याद आते ही उसके पेट में कुछ-कुछ होने लगा । उसे याद आया जन्मदिन पर वह केक के बजाय समोसे खाना ज्यादा पसंद करता था । उसे तीखा, खट्टा, चटपटा खाना बहुत ही अच्छा लगता था । गर्मियों में गन्ने का रस, सर्दियों में मूंगफली, गजक, तिल के लड्डू । यहां पर तो कुछ भी नहीं था । यह सोचते सोचते उसे कब नींद आई, पता ही न चला ।
लक्ष्य को सपना आया कि उसके पास यूरो ( जर्मनी की मुद्रा ) के ढेर लगे हैं और लक्ष्य ढेर के ऊपर दौड़ता हुआ गोलगप्पे के ठेले के पास जाने की कोशिश कर रहा है । वह जैसे ही ठेले के पास पहुंचता है, सारे गोलगप्पे चारों और गिर जाते हैं और पानी फैल जाता है । लक्ष्य को एक झटका लगता है । एकदम से उसकी आंख खुली जाती है । उसे बहुत तेज भूख महसूस होती है । वह किचन में जाता है खाना निकालता है पर उससे कुछ भी नहीं खाया जाता । सब बेस्वाद लगता है ।
सुबह टीना, लक्ष्य को देखकर कहती है, "लक्ष्य मुझे तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही । क्या हुआ, सब ठीक तो है ?"
लक्ष्य कहता है, "टीना, हम भारत चलेंगे । तुम क्या कहती हो ?"
टीना ने कहा, "मैं हमेशा से यहीं रही हूं, लेकिन मेरी एक ख्वाहिश थी कि मैं भारत जाऊं । मैं तुम पर दबाव बनाकर तुम्हें भारत नहीं ले जाना चाहती थी ।"
लक्ष्य ने टीना से आगे कहा, "लेकिन टीना यहां और वहां के रहन-सहन में बहुत अंतर है ।"
"हां, मुझे मालूम है । मैं वहां गई नहीं तो क्या, मैं वहां के बारे में बहुत कुछ जानती हूं । तुमसे मिलने से पहले मैं, पापा से वहां की बातें सुनती थी ।"
लक्ष्य, टीना की बात सुनकर बहुत खुश हुआ । कुछ दिनों बाद उसकी कंपनी भारत में एक नया प्रोजेक्ट शुरू करने वाली थी तो लक्ष्य और टीना ने इस प्रोजेक्ट में काम करने की इच्छा जताई और इस तरह से उन्हें भारत वापस आने का जल्द ही मौका मिल गया ।
हम अपने देश लौटेंगे यह सोचकर ही लक्ष्य खुशी से झूम उठा और मां को बताया ।
सविता जी अब बहुत खुश थी कि वह अपने देश लौट पाएंगी ।

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