आज रात मुझे कुछ ज्यादा लंबी प्रतीत हो रही थी। कोई नहीं था ,पास मे मेरे,  मै कुछ ज्यादा ही बैचेन हो रही थी ।आँखो के कोरे से आँसु ढुलक रहे थे। 

उस पर से उसकी याद मुझे रह रहकर आ रही थी। मेरे अतीत के पन्ने मेरे आँखो के सामने फड़फड़ा रहे थे।

याद है मुझे वो दिन , एक दो दिन ही हुए थे स्कूल ज्वाईन किऐ हुए।  पहला अनुभव था मेरा। 

मै पढा रही थी बच्चों को क्लास मे अचानक से दो बच्चीयाँ आपस मे लड़ पड़ी । ऊपर से बाकी बच्चे शोर करने लगे मै घबरा गई । फिर भी मैने छुड़ाने की बहुत कोशिश की मगर एक दूसरे पर वो दोनो इस कद्र हावी हो गई की मेरे सारे प्रयास विफल हो गए । यह बात पूरे जूनियर सेक्शन मे फैल गई । शोर सुनकर सलौनी मैम आकर , लड़ाई करती हुई दोनो बच्चीयो को छुड़ाया ,और मुझे कहा कि आप भी आँफिस मे आईए 
। मै भी पीछे पीछे चल दी घबराई हुई ,

.वहांँ पर व्यास्थापक महोदय ने मुझसे पूछा
"जब यह बच्चियांँ लड़ रही तो आप क्या कर रहे थे । "
अगर इन्हें लड़ते वक्त ज्यादा चोट आ जाती तो उसका जवाब देही कौन होता ??? 

डर से मेरे हाथ पाँव ढीले हो रहे थे.। और माथे से पसीना टपक रहा थे ..लेकिन मेरे मुहँ से एक शब्द नहीं निकल रहा था और वो उतने ही जोर से मुझ पर लाल पीले हो रहे थे ..मेरे आँखो से गंँगा जमुना बहने लगी..और मै बेतहाशा रोने लगी ।

छुट्टी टाईम की यह बात थी..छुट्टी की बेल रींग होते ही
मै भी आँफिस से उठी ,भागते हुए क्लास रूम से अपनी बैग ली और सुबकते सुबकते आँसु पोंछते हुए साड़ी के पल्लू से अपने घर को निकल पड़ी।

मुझे पैसो की सख्त जरूरत है अगर मैने हैंडल करना नहीं सीखा तो कैसे होगा?? अगर मेरे हाथो से नौकरी छूट गई तो मै क्या करूंँगी ..कहाँ से आएँगें पैसे ??रात को यही सोचते हुए मै नींद के आगोश मे कब आ गई 
मुझे पता ही नही चला।

सुबह पाँच बजे का अलार्म बजते ही मेरी नींद खुल गई। सर बहुत भारी लग रहा था ।उठते ही कल की बाते मेरे दिमाग मे घूमने लगी...पता नही क्या होगा ?? ये सोचते हुए मन मे बहुत उथल पुथल मची हुई थी मगर फिर भी अपना जल्दी से काम निपटाना शुरु किया । तैयार होकर स्कूल पहुंँच गई । 

डर से हार्ट बीट बहुत तेज चल रही थी । स्कूल के गेट मे घुसते ही मैने देखा व्यव्स्थापक महोदय चहलकदमी कर रहे थे। मेरे करीब जाते ही उन्होंने मुझसे माँफी माँगी अपने कल के बर्ताव के लिए, 
मै तो हतप्रत ही हो गई , मन मे सोचा ये खड़ुस आज मुझसे माँफी कैसे माँग रहे है ,कल तो इन्होंने ने जान ही ले ली थी मेरी। 

व्यस्थापक महोदय ने कहा प्रीति जी मै आपसे बात कर रहा हूँ ..उन्होंने अपना परिचय दिया मै देवन्द्र प्रसाद ..सभी लोग मुझे देव सर बुलाते है आप भी मुझे यही संबोधन से बुला सकती है । 

मैने धीरे से कहा जी ।

देव सर ने कहा असल मे ,मै खुद भी बहुत परेशान हो गया था इन दोनो ने इतनी बुरी तरीका से नोंच रखा था
पैरेंट्स  भी कंम्लेन करते तो जवाब मुझे देना होता है।
स्कूल मे अनुशासन होना बहुत जरुरी है । ये तो अच्छा हुआ शालिनी मैम वक्त पर आ गई । ज्यादा चोट नहीं आई किसी को भी। वरना स्कूल की बदनामी होने का डर रहता है । और पैरेंट्स को अपनी बच्चों की असुरक्षा की ।

व्यस्थापक महोदय -" मै समझ सकता हूँ कि आप नई हो तो आपको क्लास संँभालने और बच्चों को समझने मे थोड़ा समय लगेगा। आशा करता हूँ आप मेरी बात को समझेगी।
जाईये अपनी क्लास मे , कुछ भी परेशानी हो मुझसे
कहिएगा । "

प्रिति -  चुपचाप क्लास मे चली जाती है। लंँच ब्रेक मे 
स्टाफ रूम मे सभी शिक्षिकाएँ आपस मे बात कर रही थी। शालिनी मैम  ने पूछा प्रीति जी आप ठीक तो है न

प्रीति  ने कहा " जी "..

शालिनी जी ने कहा "चलिए लंँच कर लेते है ।"

प्रिति ..आप कर लिजिए मेरा मूड नहीं है

शालिनी -  ने कहा "आप कल को लेकर परेशान हो  देव सर ने आप पर गुस्सा किया उसको लेकर मूड आँफ है"

प्रिति ने कहा  - "नहीं ..उन्होंने ने तो मुझसे सुबह ही माँफी माँग ली अपने कल के बर्ताव के लिए ।"

शालिनी  ..आश्चर्यचकित होकर , अपनी आँखो को बड़ी करती हुई कहा ..सच मे!!!

देव सर ने आपसे माँफी माँगी ..उनका गुस्सा तो नाक पे धरा रहता है ऐनीटाईम । वो जब देखो सबको 
डाँटते रहते है।

मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है की उन्होंने आपसे माफी माँगी। चलिए अच्छी बात है देर से सही किसी के आँसु से तो उनको फर्क पड़ा।
कहकर वो हँसने लगी।

प्रिति ने कुछ नहीं कहा वो शायद अपने ही ख्यालो मे गुम होकर सोच रही थी।

शालिनी ने कहा प्रिति जी .."क्या हुआ आप कहाँ गुम है?? मै आपसे बातें कर रही हूंँ आपका ध्यान किधर है ।"

प्रिति  -."जी शालिनी जी मै सुन रही हूँ।"

"आप ऐसा करिए शालिनी जी आप खाईये मै थोड़ा बाहर बैठती हूँ खुले आसमान के नीचे.."

शालिनी - ..प्रिति जी चलिए मै भी चलती हूँ आपके साथ..आप तो अभी नई आई हो ..मुझे तो हो गए
स्कूल को ज्वाइन किऐ दो तीन साल ।
आपको घूमा देती हूँ स्कूल ..कहाँ क्या है दिखा देती हूँ


प्रिति अरे आप क्यों.परेशान हो रही हूँ दिखा देना धीरे-धीरे पहले लँच तो कर लीजिए नहीं तो मेरी वजह से आप भी भूखी रह जाओगी ।

शालिनी मेरी फिक्र मत करिऐ  मैं बहुत बड़ी भुक्कड़ हूंँ देखिये आपके साथ बात करते-करते मैंने अपना लंँच खत्म कर लिया ।

प्रिति ने शालिनी की तरफ देखकर हल्का सा मुस्कुरा दिया।

तब तक लंँच टाईम ओवर हो चुका था ।  सभी अपने - अपने क्लास चले गए । 

दो पीरीयड के बाद स्कूल की छुट्टी की बेल रिंग हो गई । मैने अपना समान बैग मे डाला बच्चों को लाईन मे लगाकर एक -एक करके उनके पैरेंट्स को 
बच्चों को सौंपा ही था । 

, तब तक मे मेरे पास शालिनी आ गई बोली एक साथ चले हम घर ।

प्रिति - मैने  कहा  "हम्म"

शालिनी  ने कहा इसी बहाने एक दूसरे से पहचान हो जाएगी । बातो ही बातो मे रास्ता आसान हो जाएगा। 

हम दोनो रास्ते मे एकसाथ पैदल चलने लगे।


शालिनी ने कहा "जानते हो प्रीति जी कल आप रो 
रहे थे तब बहुत प्यारे लग रहे थे । बड़े बड़े आँखो से 
मोती गिर रहे थे। रोने से आपकी नाक लाल हो गई थी । मगर वो स्थिति ऐसी थी की ना मै आपको देख पाई
ना आपको चुप करा पाई और सर इतने गुस्सैल है कि 
उनके सामने अच्छे से अच्छो की बोलती बंँद हो जाती है।"

शालिनी ने पूछा - "आपके घर मे कौन - कौन है प्रीति जी ।"

प्रीति ने  कहा  "मै एक छः महीने की बच्चे की माँ हूँ ।"




क्रमशः