सूरज छिपने की तैयारी में है । मेरा सफर अभी बाकी है ।
उम्मीद है मैं जयपुर सात बजे तक पहुंच जाऊं । बस को लगातार चलना है । अब बीच में कोई स्टॉप नहीं है ।
मैं जयपुर कई बार आ चुका, लेकिन घूमने के इरादे से पहली बार घर से निकला हूं । जयपुर में मेरी दीदी स्नेहा रहती है । सोचा इस बार दीदी से मिलने के साथ ही जयपुर भी देख लिया जाए । मैं बस की खिड़की से बाहर के नजारे देखने में व्यस्त था । दूर पहाड़ियां नजर आ रही थी । कहीं कहीं ऊंची पहाड़ी पर मंदिर बने दिख जाते हैं । तो किसी पर किला । अचानक बस को तेजी से ब्रेक लगा और सारी सवारियां आगे को झुक गई । इस झटके ने मेरी तंद्रा भी भंग कर दी । सब सवारियां उचक - उचक कर देखने की कोशिश करने लगी कि बिना स्टॉप के ड्राइवर ने बस क्यों रोकी ।
एक बीस - इक्कीस साल की लड़की बस में चढ़ी । कंडक्टर उस पर चिल्लाने लगा, "अरे मरने का इरादा था क्या ? जो चलती बस के आगे आकर खड़ी हो गई । सही समय पर ब्रेक नहीं लगता ना, तो अभी ऊपर पहुंच जाती । यह कोई बस स्टॉप थोड़ी ना है, जो बस रुकवा ली ।"
कंडक्टर बोले ही जा रहा था । लेकिन लड़की बदहवास सी स्थिति में थी । वह अपनी सांसो को संयत करने की कोशिश कर रही थी । मेरी नजर उस पर टिक गई । मुझे उसकी आंखों में आंसू नजर आ रहे थे । वह शायद खाली सीट ढूंढ रही थी । मैं एकदम खड़ा हो गया । मेरे साथ वाली सीट खाली थी । मेरे खड़े होते ही उसकी निगाह मुझ पर गई और फिर खाली सीट पर । वह आगे बढ़कर सीट पर बैठ गई । मैं भी साथ ही बैठ गया । बस अपने गंतव्य स्थान की ओर बढ़ चली ।
कंडक्टर पास आकर बोला, "टिकट के पचास रुपए निकालो ।"
यह सुनते ही लड़की थोड़ी परेशान हो गई ।
मैंने कहा, "अभी उसे ठीक से बैठने तो दो । कहीं भागे थोड़ी ना जा रही है, ले लेगी ।"
कंडक्टर अपनी सीट पर जाकर बैठ गया । बस ने गति पकड़ ली थी । वह लड़की सहज होने की कोशिश कर रही थी । मुझे लग रहा था उसके पास पैसे नहीं है ।
मैंने पूछा, "क्या आपके पास टिकट के पैसे हैं ?"
उसने गर्दन झुकाए 'ना' में सिर हिला दिया ।
मैंने अपने पर्स से पचास रुपए उसे देते हुए कहा, "आप टिकट ले लीजिए, नहीं तो कंडक्टर फिर जोर-जोर से अनाप-शनाप बोलने लगेगा ।"
उसे देखते हुए लग रहा था कि वह बहुत मजबूरी से अपना हाथ आगे कर पैसे पकड़ रही है । उसकी आंखों से आंसू बस टपकने ही वाले थे । उसने जल्दी से अपने आंसू पोंछे और कंडक्टर की तरफ नोट बढ़ा दिया । कंडक्टर ने उससे पैसे लेकर टिकट थमा दिया । बस के सभी लोग हमें ही देख रहे थे । जिसमें अधिकतर गांव वाले थे ।
मैंने उस लड़की से पूछा, "जयपुर में कहां जाना है ?"
उसकी आंसू भरी आंखें हैरत से फैल गई और उसके मुंह से अस्फुट स्वर निकला, "ज.य.पु.र ?"
"हां, यह बस जयपुर तक ही जाएगी । वही आखिरी स्टॉप
है ।" मैंने उसे बताया ।
वह अपने आंसू साफ करते हुए बोली, "मुझे तो दिल्ली जाना है ।"
अब चौंकने की बारी मेरी थी । मैंने कहा, "यह बस दिल्ली से आ रही है । एक घंटे बाद जयपुर पहुंच जाएगी ।"
उसने अपनी आंखें बंद कर ली । आंखों में भरे आंसू अविरल बहने लगे ।
इस समय हमारी बस सूनी सड़क पर चल रही थी ।
जयपुर पहुंचने पर बस से सभी यात्री उतर गए । वह लड़की भी बहुत ही थके कदमों से बस से उतरी ।
मैंने पूछा, "आपको कोई मदद चाहिए ?"
उसने 'ना' में सिर हिला दिया ।
मैं अपना बैग लेकर आगे बढ़ गया । दस - पन्द्रह कदम दूर ही चल पाया कि मैंने पीछे मुड़ कर देखा । वह अब भी वहीं खड़ी थी । सात बज चुके थे । अंधेरा भी हो गया था । वह दिल्ली जाना चाहती थी लेकिन जयपुर बस स्टॉप पर अकेली खड़ी थी । उसके बारे में सोच कर मैं एक कदम और आगे ना बढ़ा पाया ।
मैं उसके पास आकर बोला, "मेरा नाम पवन है । मैं दिल्ली में रहता हूं । जयपुर में अपनी दीदी से मिलने और घूमने आया हूं । मैं आपकी मदद कर सकता हूं ।"
मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि वह मुझे गलत ना समझे । वह कुछ नहीं बोली ।
मैंने आसपास देखते हुए कहा, "थोड़ी देर में यह जगह खाली हो जाएगी । आपको कहीं जाने के लिए कोई साधन नहीं मिलेगा । आपकी तकलीफ और बढ़ जाएगी । आप समझ रही है ना कि मैं क्या कह रहा हूं ?"
उसने धीरे से 'हां' में गर्दन हिलाई और अपने रोने पर काबू करते हुए बड़ी मुश्किल से बोली, "मुझे दिल्ली जाना था । वहां मेरे भैया हैं ।"
मैंने कहा, "तुम दिल्ली जाने के लिए निकली हो, तुम्हारे पास ना बैग है ना पैसे और गलत दिशा की बस में बैठ गई हो ।"
वह सुबकने लगी ।
मैंने कहा, "ठीक है, तुम शांत हो जाओ । ऐसी स्थिति में मैं जानते - बुझते तुम्हें नहीं छोड़ सकता । यदि तुम मुझ पर विश्वास कर सको तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं ।"
उसने 'हां' में सिर हिलाया ।
मैंने कहा, "पहले यहां से आगे बढ़ो । ड्राइवर और कंडक्टर हमें ही देख रहे हैं ।"
वह मेरे साथ चलने लगी ।
एक चाय की दुकान पर मैंने दो चाय मंगाई, तभी दीदी का फोन आ गया ।
"हां दीदी बस थोड़ी देर में पहुंच जाऊंगा । दीदी, मेरे साथ मेरी दोस्त भी है । हां ठीक है, मैं आता हूं ।
फोन कट होने पर मैंने पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है ?"
"रूपा"
मैंने कहा, "रूपा मैं तुम्हारे लिए एक बैग और दो जोड़ी कपड़े ले देता हूं । जब मैं दिल्ली जाऊंगा, तुम भी अपने भैया के पास चली जाना । अभी एक दोस्त की हैसियत से दो दिन तुम दीदी के पास रहना । बोलो, ठीक है ना ?"
उसने 'हां' में गर्दन हिलाई ।
मैंने उसे कपड़े और बैग दिला दिए । वह मुंह धो कर आई । मैंने अपनी कंघी उसे बाल ठीक करने के लिए दी । अब वह पहले से काफी ठीक लग रही थी । हम दीदी के घर मानसरोवर कॉलोनी की ओर बढ़े । वह बिल्कुल चुप थी । और अब बोलने को मेरे पास भी कुछ नहीं था ।
दीदी ने दरवाजा खोला । रिंकी और पिंकू दोनों दौड़ कर मेरे पास आ गए और बोले, "मामा जी कितनी देर लगा दी । हम कब से आपका इंतजार कर रहे हैं ।"
दीदी हंसते हुए बोली, "पवन, इन्होंने खाना भी नहीं खाया । बोले, मामा जी के साथ ही खाएंगे ।"
हम अंदर आकर बैठे । रिंकी और पिंकू रुपा को देखते हुए बोले, "यह कौन है मामा जी ?"
मैंने दोनों को अपने पास बिठाते हुए कहा, "यह मेरी दोस्त
है ।"
दीदी मुझे देख रही थी लेकिन कहा कुछ नहीं ।
मैंने दीदी से कहा, "दीदी, कल मैं पूरा दिन जयपुर घूमने वाला हूं । आप तैयारी कर लेना ।"
दीदी बोली, "नहीं पवन, मैं नहीं जा पाऊंगी । कल से पिंकू के टेस्ट हैं । तुम्हें अकेले ही घूमने जाना होगा । अरे अकेले क्यों ? तुम्हारे साथ यह..."
मैंने जल्दी से कहा, "यह रूपा है दीदी, मेरी दोस्त । यह भी जयपुर घूमना चाहती थी इसलिए अपने साथ ले आया ।"
सुबह मैं उठा तो रूपा, दीदी की रसोई में मदद कर रही थी । मुझे देखते ही दीदी बोली, "पवन, रूपा तो रसोई का काम बहुत ही बेहतरीन करती है । देखो सुबह-सुबह क्या कुछ बना डाला ।"
मेरी नजर रूपा पर गई । कल के खरीदे नए कपड़े उस पर बहुत जंच रहे थे । अपनी तारीफ सुनकर वह शरमा गई ।
दीदी से आज्ञा लेकर हम जयपुर घूमने के लिए निकल गए । रूपा की उदासी पहले से कम हो गई थी । शायद अब मेरे साथ वह सहज महसूस कर रही थी
रूपा से बात शुरू करते हुए मैंने कहा, "रूपा तुम्हें पता है जयपुर का मतलब क्या है ?"
उसने 'ना' में गर्दन हिला दी ।
"जयपुर का मतलब है, जीत का नगर ।"
उत्तर सुनकर उसके चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया ।
मैंने आगे कहा, "तुमने कौन-कौन सी जगह देखी है ?"
उसने बिना मेरी तरफ देखे धीरे से कहा, "मैं कभी घर से बाहर नहीं निकली ।"
मैंने महसूस किया उसकी आंखें नम हो गई थी ।
हम जयपुर के सिटी पैलेस पहुंचे । रूपा की आंखें हैरत से फैल गई । जब उसने सिटी पैलेस के प्रवेश द्वार पर प्रहरी की तरह खड़े दो नक्काशीदार संगमरमर के हाथी देखें ।
रूपा को देखकर मुझे लगा जैसे मेरा जीवन, मेरा सफर, सब पूरा हो गया हो । रूपा की भावभंगिमा एकदम बदल गई । उसे देखकर लग रहा था कि जैसे वह किसी दूसरी ही दुनिया को देख रही है । सिटी पैलेस के अंदर भूरे संगमरमर के स्तंभों पर टिके नक्काशीदार मेहराब जो कि सोने व पत्थरों की फूलों वाली आकृतियों से सजे थे, सब को देखकर रूपा चिहुंक उठी थी । वह अपने आप को ही भूल गई थी । उसकी खुशी को देखकर मुझे आत्मिक खुशी महसूस हो रही थी । हालांकि सिटी पैलेस मैं भी पहली बार ही देख रहा था ।
घूमते - घूमते दोपहर होने लगी । हम बाहर निकले कुछ खाया - पिया ।
मैंने रूपा से कहा, "अब हम जंतर मंतर चलेंगे ।"
वहां मैं रूपा को जंतर मंतर के बारे में बताने लगा ।
मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं कितना ज्ञानी हूं । रूपा मेरी बातों को ध्यान से सुन रही थी । लेकिन अभी तक वह कुछ बोली नहीं थी । चार बजने को थे, हम हवा महल पहुंचे । रूपा को हवा महल बहुत ही पसंद आया ।
मैंने कहा, "रूपा शाही घरानों की स्त्रियां यहां से नगर के जुलूस देखती थी लेकिन बाहर से कोई भी अंदर नहीं देख सकता था ।"
रूपा मेरी बातों में रूचि लेने लगी थी । शाम होने लगी । हम काफी थक गए थे । हम एक रेस्टोरेंट में बैठे और चाय स्नेक्स आर्डर किए । रूपा की उदासी काफी हद तक कम हो गई । मैं उसके बारे में जानना चाहता था ।
मैंने कहा, "रूपा, हम कल गलताजी और मोती डूंगरी देखने चलेंगे ।"
वह पहली बार बोली, "मैं भैया के पास कब जाऊंगी ?"
जिस मासूमियत से रूपा ने मेरी तरफ देखकर कहा था, मैं भैया के पास कब जाऊंगी । मेरा दिल कर रहा था, मैं अभी इसी वक्त उसके भैया को ला कर सामने खड़ा कर दूं । मुझे लग रहा था, ईश्वर ने मुझे चुना है रूपा को सही सलामत उसके भैया तक पहुंचाने के लिए ।
प्रत्यक्ष रूप में मैंने कहा, "हम कल ही दिल्ली चलेंगे । मैं फिर कभी दोबारा जयपुर घूमने आ जाऊंगा । वैसे भी मेरे पास छुट्टियां कम है । तुम्हारे भैया को भी तो ढूंढना पड़ेगा । यदि तुम चाहो तो अपने और अपने भैया के बारे में मुझे बता सकती हो ।"
वह सोचने लगी जैसे कि कहां से शुरू करें ।
वह बोली, "मेरे माता-पिता नहीं है । एक बड़ा भाई और एक सौतेली मां है । दो दिन पहले ही भैया काम करने दिल्ली गए हैं । उनके जाते ही मां, मेरी शादी एक अमीर बूढ़े से करना चाहती है क्योंकि वह बूढ़ा उन्हें बदले में बहुत पैसा देगा । मां, भैया से बोल देगी कि मैं किसी के साथ भाग गई । यह सब बातें मैंने कल मां को किसी से कहते हुए सुन ली ।
मैं वहां से बच निकली लेकिन मां को पता चल गया और उन्होंने मेरे पीछे दो लड़के लगा दिए । मैं उनसे बचते - बचाते कल बस में बैठी थी ।"
यह कहकर रूपा रोने लगी । मैंने उसे रोने दिया ।
वह थोड़ी सहज हुई तो मैंने पूछा, "तुम्हारे भैया का नाम क्या है ? दिल्ली में तुम्हारे भैया कौन सी जगह गए हैं ।"
"भैया का नाम किशोर है । वह कह रहे थे, नई दिल्ली स्टेशन के पास पहाड़गंज कोई जगह है उन्हें वहीं काम मिला है ।"
मैंने कहा, "ठीक है, हम कल ही चलेंगे और तुम्हारे भैया को ढूंढ लेंगे । लेकिन एक शर्त है अब तुम दोबारा उदास नहीं होना ना ही रोना । मंजूर है ।"
वह हल्के से मुस्कुराई और 'हां' में गर्दन हिलाते हुए आंसू पोंछ लिए ।
मैंने रिंकी और पिंकू के लिए खिलौने खरीदे । दीदी और जीजू के लिए मां ने पहले ही कपड़े दे दिए थे । मैंने उनके लिए मिठाई खरीद ली और घर की ओर चल दिए ।
घर पहुंचते ही दीदी ने कहा, "अरे, तुम लोग बहुत जल्दी आ गए । अच्छा नहीं लगा क्या ?"
मैंने कहा, "नहीं दीदी, ऐसी बात नहीं । हमें कल सुबह दिल्ली के लिए निकलना है ।"
दीदी के चेहरे पर बहुत से प्रश्न थे । पर मैंने कुछ नहीं कहा । दीदी रसोई में चली गई रूपा भी उनकी मदद करने के लिए रसोई में गई ।
मैं रिंकी और पिंकू को खिलौने दिखाने लगा । रात को खाना खाने के बाद रूपा अपने कमरे में सोने चली गई ।
दीदी मेरे पास आकर बोली, "पवन क्या बात है ? कुछ हुआ क्या ?"
मैंने दीदी को शुरू से लेकर अब तक की सारी बात बता
दी ।
दीदी मेरा हाथ पकड़ कर बोली, "पवन, तुमने मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया । मुझे खुशी है कि तुम रूपा का साथ दे रहे हो । यदि तुम रूपा को रास्ते पर छोड़ देते तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करती और तुम भी कभी चैन की नींद नहीं सो पाते ।"
सुबह हम दिल्ली जाने को तैयार थे । दीदी ने रूपा को उपहार दिया और फिर मिलने के लिए कहा । रूपा उन से बिछड़ते हुए भावुक हो गई । हमने बस अड्डे से दिल्ली के लिए बस ली । एक बार फिर मैं और रूपा साथ - साथ बैठे हुए थे । लेकिन अब हमारी भावनाएं एक - दूसरे के लिए कुछ अलग थी । रूपा खिड़की से बाहर तेजी से जाते पेड़, पहाड़, लोगों को देख रही थी । उसके बाल उड़ - उड़ कर उसके चेहरे पर आ रहे थे, जिन्हें वह बार-बार हटा रही थी । मैं रूपा को देख रहा था । जैसे ही रूपा मेरी तरफ देखती, मैं बाहर देखने लगता । बीच में एक जगह बस रुकी ताकि लोग चाय, पानी ले सके । लेकिन हम दोनों नीचे नहीं उतरे । शायद साथ बैठे हुए हम एक - दूसरे को बहुत करीब महसूस कर रहे थे । बस फिर से चल पड़ी । हम बिल्कुल भी बात नहीं कर रहे थे । लेकिन मेरे विचारों में बस रूपा ही थी ।
दिल्ली आने वाला था । आधे घंटे बाद हम दिल्ली पहुंच जाएंगे । मैं सोचने लगा कि रूपा के भाई को मैं कैसे ढूंढूंगा ? तभी मुझे एक विचार आया और मैंने पूछा,
"रूपा, तुम्हारे भाई के पास फोन तो होगा ?"
रूपा ने 'ना' में गर्दन हिला दी ।
और बोली, "भैया कह रहे थे, दिल्ली पहुंचकर काम करके जब पैसे हाथ में आएंगे तो फोन खरीद लूंगा ।"
"तो क्या तुम्हारे भैया बिना किसी जान - पहचान के ऐसे ही दिल्ली चले गए ?"
"हमारे पड़ोसी बिरजू भैया दिल्ली में काम करते हैं । वे ही अपने साथ लेकर गए हैं ।"
"क्या बिरजू के पास फोन है ?"
"हां, बिरजू भैया के पास फोन है । किशोर भैया दुकान से कभी-कभी उन्हें फोन करते थे ।"
"क्या तुम्हें वह नंबर पता है ?"
"भैया ने वह नंबर दीवार पर लिख दिया था । मैं नंबर देखती तो थी, पर पता नहीं मुझे याद है कि नहीं ?"
मैंने अधीर होकर कहा, "सोचो रूपा वह नंबर सोचो । नंबर मिल गया तो तुम आज ही अपने भैया से मिल पाओगी ।"
रूपा सोचने लगी और सोच - सोच कर नंबर बताने लगी । इतने में हमारा स्टॉप आ गया । हम दोनों नीचे उतरे । रूपा हैरान - परेशान सी चारों ओर देख रही थी । आखिर वह पहली बार दिल्ली आई थी । रूपा का बताया हुआ नंबर मैंने मिलाया । वह नंबर बिरजू का ही था । मैंने फोन स्पीकर पर कर दिया ।
"बिरजू भैया, मैं रूपा बोल रही हूं ।"
बिरजू बोला, "क्या हुआ रूपा ? सब ठीक तो है ना ?"
"बिरजू भैया, मेरी बात किशोर भैया से करवा दो ।"
"रूपा मैं तो गांव जा रहा हूं । रास्ते में हूं । किशोर दिल्ली में ही है । उसके पास अभी फोन नहीं है । क्या काम है किशोर से मुझे बता ।"
रूपा रोने लगी उसने बिरजू को गांव की सारी बात बता दी । और कहा, "भैया, मैं दिल्ली पहुंच गई हूं । आप किशोर भैया का पता दे दो ।"
बिरजू बोला, "अभी तो वह काम पर होगा । तुम कमरे पर जाओ । वहां किशोर सात बजे तक पहुंचेगा । तुम वहीं उसका इंतजार करना । रूपा, तुम जिन बाबू साहब के साथ दिल्ली आई हो, उनसे धन्यवाद कहना जो उन्होंने तुम्हारी मदद की । गांव पहुंचकर मैं तुम्हारी मां की अच्छी खबर लूंगा । तुम चिंता मत करना ।"
रूपा रोते-रोते बोली, "बिरजू भैया, हम भैया के साथ गांव आएंगे ।"
"हां बहना, तुम अपना ध्यान रखना और किशोर से मिलने के बाद मुझे फिर से फोन करना ।"
बिरजू ने किशोर के कमरे का पता बता दिया ।
पवन और रूपा, बिरजू के दिए पते पर पहुंचे । वहां ताला लगा हुआ था । शाम के छः बज गए थे और किशोर सात बजे तक आने वाला था । रूपा के लिए ना जाने वह एक घंटा कैसे बीता । मेरे लिए तो बहुत जल्दी बीत गया था । तभी रूपा को किशोर आते हुए दिखा । किशोर ने भी उसे देख लिया । वह हैरत से दौड़ता हुआ रूपा के पास आया और सवालों की झड़ी लगा दी । दोनों बहन - भाई गले लग कर रोने लगे । मैं बस दोनों को देखे जा रहा था । जैसे-तैसे
दोनों शांत हुए । रूपा ने अपनी आपबीती किशोर को
बताई । किशोर मेरे पांव पकड़ने लगा कि मैंने उसकी बहन को सही सलामत उस तक पहुंचा दिया । मेरी भी आंखें भीग गई थी ।
उनसे विदा लेकर मैं अपने घर जाने के लिए एक बार फिर बस में बैठा । लेकिन अब मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरा कुछ खो गया है । मुझ में कुछ कम हो गया है ।
मेरा यह सफर ऐसा था जिसमें मैंने कुछ भी नहीं देखा था ।मैं तो रूपा को देखते हुए देख रहा था ।
मैंने कहीं भी एक भी फोटो नहीं ली । "ओ शिट, यह मैंने क्या किया ? मुझे रूपा की फोटो तो लेनी चाहिए थी ।"
मुझे रूपा का चेहरा याद आ रहा था, जब वह मुझे छोड़ने बाहर तक आई थी । मैं उसकी आंखों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था कि क्या वह भी मुझे दोबारा देखना चाहती हैं ? और मुझे लग रहा था वे आंखें 'हां' कह रही हैं ।

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