कामतापुर एक छोटा -सा सुंदर गाँव था । वैसे वह एक गांव था ,पर किसी शहर से कम नहीं था। पास ही तीन किलोमीटर की दूरी पर रामगढ़ शहर था। कामतापुर चारों ओर पहाड़ियों से घिरा था। यहाँ आसपास की पहाडियों में सुंदर झरने थे। सरकार ने इसे एक टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित किया। पहाड़ी ढलानों में चाय की खेती होती थी। चारों ओर चाय के बागान थे। पहाड़ियों में अधिक ऊंचाई पर घने जंगल भी थे, जिसका संरक्षण वन विभाग करता था। अतः कामतापुर गांव एक समृद्ध गांव था। पहाड़ियों की ऊंचाई पर घने जंगलो में एक अभयारण्य भी था, जिसमें, बाघ, शेर, हाथी आदि जानवरों का संरक्षण किया जाता था। अनेक झरने पिकनिक स्पॉट भी थे।इसलिए कामतापुर , चाय बगान के मालिकों, मजदूरों के रोज आनेजाने तथा टूरिस्टों और पिकनिक मनाने वालों की भीड़ से देर शाम तक खचाखच भरा रहता था। रात होते ही गांव सुनसान हो जाता था। ऊपर पहाड़ियों में कुछ होटल और गेस्ट हाउस थे ,जहां टूरिस्ट लोग ठहरते थे।
कामतापुर गांव में कई रेस्त्रां, दुकानें आदि थे, जो दिन भर आनेवाले चाय बागान के मजदूरों, टूरिस्टों ,पिकनिक मनाने आये लोगों से भरा रहता। सभी लोग रेस्त्राओं में चाय, नाश्ता, भोजन आदि करते और उन दुकानों में पहाड़ियों में मिलनेवाली शहद, जड़ीबूटियों , चूड़ियों, मालाओं ,श्रृंगार सामग्रियों, पहाड़ी पोशाकों और भी तरह तरह की दुर्लभ वस्तुओं को खरीदते। कामतापुर के रहनेवाले रेस्त्रां चलाते या इन वस्तुओं की दुकान चलाते थे।। इन्हीं लोगों में एक रामकृपाल था। उसकी एक रेस्त्रां थी और पास में ही उसका घर था। उसकी रेस्त्रां बड़ी अच्छी चलती थी। उन्हीं पहाड़ियों में उसका एक छोटा बागान था जिसमेँ आम और केले के पेड़ थे। रेस्त्रां और इस बागान से अच्छी आमदनी हो जाती थी। सुधा उसकी इकलौती बेटी थी। सुधा अठारह वर्ष की पतली,गोरी ,सुंदर नैन-नक्श वाली लड़की थी। हाल में ही वह रामगढ़ के कालेज में बी .ए. में दाखिला ली।
रामगढ़ छोटा शहर था,पर रईसों का शहर था। वहां कामतापुर के पहाडियों में चाय बागानों के मालिक, होटल व्यवसायी और वन- विभाग के अफसरों और ठेकेदारों का वास था। सभी अय्याशी का जीवन जीते थे।रामगढ़ में जमीन- जायदाद और कामतापुर में उनका कारोबार ,कुल मिलाकर वे एक समृद्ध अय्याशी भरा जीवन बिताते थे।
सूबेदार सिंह रामगढ़ के इन्हीं रईसों में सबसे अधिक प्रभावशाली और दबंग रईस था। उनका एक बेटा रंजीत इक्कीस वर्ष का नौजवान था। वह रामगढ़ के कालेज में बी.ए.के अंतिम वर्ष का छात्र था। वह अमीर बाप का बिगड़ा बेटा था। जवानी की दहलीज में कदम रखते ही वह कई दुर्व्यसनों का आदी हो गया था। सिगरेट फूंकना, जुआं खेलना और शराब पीने की उसे लत थी। उसके साथ उसके दोस्तों की टोली हमेशा रहती थी। वे सब आवारागर्दी करते और लड़कियों के साथ छेड़खानी करते थे। कालेज में कई लड़कियों से उसके संबंध थे पर वह और उसके साथी आवारा लड़के उन्हें डरा धमका कर चुप रहने को बाध्य करते। कालेज में जो नई लड़कियां आती, उनसे वह दोस्ती का बहाना कर उन्हें जाल में फांस लेता था। नई लड़कियों के सामने वह भोला -भाला दिखने का नाटक करता और उस समय उसके आवारा दोस्तों को पास फटकने नहीं देता। जब.विशेष जरूरत होती तब वह उस टोली को लेकर चलता। इस तरह वह जब तब नई लड़कियों के साथ घूमता और अपने पुराने दोस्तीवाली लड़कियों को धमका कर उन्हें अपने हाल पर छोड़ देता। लड़कियां भी डर के कारण किसी से कुछ नहीं कहती थी। कभी -कभी वह लड़कियों को किसी न किसी तरह फांसकर कामतापुर के पहाड़ियों में अपने गेस्ट हाउस पर ले जाता था और उनकी जिंदगी से खिलवाड़ करता था।
पर इलाके के सभी लोग सूबेदार सिंह के रोब और दबदबे के कारण मुँह खोलने से ढरते थे। पुलिस, कानून सब ही सूबेदार सिंह के मुट्ठी में थे। सूबेदार सिंह का चेहरा बाहर एक बड़ा परोपकारी और समाजसेवी का था। बाहर से वह एक सज्जन और सभ्रांत व्यक्ति लगता था। उसका असली घिनौना चेहरा वही जानता जो उनके चक्कर में फंसता था।
एक बार उसके जाल में फंसने से या तो उसे उसी के इशारे पर नाचना पड़ता या अपनी जान से हाथ धोना पडता।
उसका बेटा रंजीत भी बाप के सभी गुण विरासत में पाया था और उसीके नक्शेकदम चल रहा था। उसके बाप ने भी उसे पूरी छूट दे रखी थी और अपने गेस्टहाउस में उसके क्रियाकलापों को पूरा शह देता था।
सुधा सीधी -सादी और सुंदर लड़की थी। उसे देखते ही रंजीत उस पर लट्टू हो गया। उसकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि अपनी भोली सूरत और चिकनी- चुपड़ी बातों से सामनेवाली लड़की को जरा -सा भी उसके घिनौने चेहरे और गंदे इरादों का भनक तक नहीं लगता था। वह इतनी हमदर्दी और भोलापन दिखाता कि लड़कियाँ उसके जाल में फंस जाती और जब तक उसे असलियत का पता चलता,बहुत देर हो जाती थी।सुधा के साथ भी यही हुआ।
रंजीत सुधा से दोस्ती कर उससे मीठी मीठी बातें कर उसे पूरी तरह अपने वश में कर लिया। सुधा उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ गई। वह उस पर पूरा विश्वास करने लगी।
उन दिनोंं कामतापुर के निकट पहाड़ियों में स्थित कालीबाड़ी के काली मंदिर में नवरात्र का मेला लगा था। लोग भारी तादाद में आसपास के गांव शहरों से मेला देखने आने लगे। एक दिन रंजीत ने सुधा से मेला देखने का प्रस्ताव रख दिया। सुधा के माता- पिता भी रंजीत को अच्छा लड़का समझते थे और उसे जाने दिया। मेला देखने के बाद वह अपना गेस्ट हाउस दिखाने ले गया।तब तक घना अंधेरा हो चुका था। रंजीत पर भूत सवार था , वह सुधा को बहला फुसलाकर अपने मंशा में कामयाब हो गया। घबराई सुधा को उसने समझाया कि कुछ ही दिनों में वह उससे ब्याह करेगा और कहा कि उसके माता -पिता पूरी तरह राजी होंगे। दोनों मेले से वापस आ गये। पर सुधा के मन में एक अज्ञात डर घर कर गया था। वह अक्सर रंजीत से कहती कि हम जल्दी से व्याह कर लें। रंजीत हमेशा टालमटोल करता। सुधा के इस रोज -रोज के दबाव से वह तंग आ गया। उसने अपने दिमाग में एक भयानक योजना बनाई।
एक दिन वह सुधा से काली माता के मंदिर जाकर मन्नत मांगने का प्रस्ताव रखा। सुधा खुशी खुशी राजी हो गई और घर में बिना बताये रंजीत के साथ निकल पड़ी। शाम को वे मंदिर के पास पहुंचे। मंदिर में देवी के दर्शन कर वे दोनों निकले । फिर पास के झरने को देखने ले गया।अंधेरा गहरा रहा था। ठंडी हवा चल रही थी। एक बड़े चट्टान पर वे दोनों बैठे हुए थे। रंजीत बड़ी प्यार भरी बातें कर रहा था। जब काफी अंधेरा होने लगा, सुधा ने लौटने की बात कहकर उठ खड़ी हई। तब तब बैठा रंजीत भी उठा और उसके पीठ के पीछे था। अगले ही क्षण उसे पीछे से एक जोर का धक्का लगा और एक जोरदार चीख गूंज गई। उस झरने की धारा में एक लड़की का शरीर नीच़े गहरे पानी में बह गया।
"ब --चा --- ओ sss" की एक चीख गूंज कर हवा में विलीन हो गई। रंजीत अपनी कार लेकर घर लौट आया।
कामतापुर गांव में सुधा की रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाना एक रहस्य ही बना रह गया। उस पर पर्दा डाल दिया गया।
दिन बीतते गये। रंजीत के कालेज की पढ़ाई जैसे तैसे पूरी हो गई। अब वह और भी ज्यादा आवारागर्दी करने लगा। अब वह अपनी खुले टॉपवाली कार लेकर उन पहाड़ियों के टेढ़े मेढ़े रास्तों पर चलाते हुए दोस्तों के साथ मटरगश्ती करता और चायबागानों में काम करनेवाली लड़कियों और औरतों से बदसलूकी करता। उसकी अमीरी की डर से और उसके बाप के दबदबे से कोई उसको रोक नहीं सकते थे। चाय बागान में काम करनेवाली कई लड़कियां गुम हो जाते थे। कालांतर में लोग इसे भूत-प्रेत या चुड़ैल का करतूत मानने लगे। पर असली वजह रंजीत की अय्याशी थी। आवारागर्दी करते हुए जौ लड़की पसंद आ जाती उसे वह गुप्त तरीके से उठवा देता और अपनी हवश का शिकार बनाता था। फिर उसे उस मंदिर के पास वाले झरने में फेंक देता। इस बात की किसी को भनक तक नहीं लगती थी। इस तरह कुछ चार छह मास बीत गये।
एक दिन रंजीत अपनी कार लेकर रोज की तरह दोस्तों के साथ पहाड़ी रास्तों पर घूम रहा था। अचानक उसे सामने सेआती एक कार दिखाई दी। उस कार को एक सुंंदर लड़की चला रही थी। उसकी सुंदरता देखकर रंजीत के मानों होश ही उड़ गये। वह एकदम सभ्य दिखने की कोशिश करने लगा। वह लड़की कार धीमी करती हुई इनके कार को रोकने का इशारा कर रही थी। कार पास में आते ही रंजीत ने आपनी कार रोक दी। उस लड़की को देखते ही वह अपना सुधबुध खो बैठा। इतनी सुंदर लड़की उसने जिंदगी में नहीं देखी थी। होश में आते हुए उसने पूछा - " कहिये , मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?" इतनी अदब से भी उसने कभी जिंदगी में बात नहीं की। उस लड़की के चेहरे पर एक अजीब मुस्कान तैर गई। उसने सकुचाते हुए पूछा - "क्या आप मुझे बता सकते हैं कि कालीबाड़ी के लियेरास्ता कहाँ से जाता है?" उसकी सुरीली आवाज सुनकर रंजीत मंत्रमुग्ध हो गया। वह उससे और बातचीत करना चाहता था। उसने पूछा-"क्या आप यहाँ नई आई हैं?"
"जी हाँ, मेरे पिताजी वन विभाग में वन संरक्षक हैंः अभी दो दिन पहले ही हम यहां आये हैं। यहां जरा घूमने निकली थी और रास्ता भटक गई।" "ओह, देखिये ,आप गाड़ी बैक करके ये जो दाईं तरफ सड़क गयी है , उस सड़क से सुधे चले जाइये। आपको एक झरना दिखाई पड़ेगा , झरने से दो सौ मीटर पर सड़क दो तरफ मुड़ जाती है। दाईं तरफ कालीमंदिर पड़ता है।आप बाईं तरफ मुड़ जाइये, वही कालीबाड़ी इलाका है।" फिर उस लड़की के चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान तैर गई।पता नहीं क्यों पहली बार रंजीत के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। पर वह उस लड़की के सुंदर चेहरे से नजरें हटा नहीं पा रहा था। रंजीत पूछा - " आपका शुभ नाम क्या है?" " जी, मेरा नाम मोहिनी है" वह लड़की बोली और कार बैक करके रंजीत के बताये रास्ते फर निखल गई।
रंजीत खोया -खोया रहने लगा। उस लड़की ने उसकी नींद चुरा ली थी। वह मन ही मन उससे प्यार करने लगा था और उससे शादी करने की बात मन में ठान ली। उसका चालढाल अब बदल गया था।अब वह साथियों से नाता तोड़ लिया। उन पहाड़ियों पर रोज कार लेकर इसी आस में निकल जाता था कि कहीं वह लड़की फिर दिख जाये। वह गुमसुम रहने लगा। तीन दिन बाद चौथे दिन वह लड़की दिखाई दी। वह सड़क के किनारे एक पत्थर पर बैठी हुई थी, मानों किसी का इंतजार कर रही हो।रंजीत कार खड़ी कर बड़ी तेजी से उसके पास जा पहुंचा। "हैलो, मोहिनी ,कैसी हो! " रंजीत बोला। वह उदासी भरे स्वर में बोली-" मैं कुछ ठीक नहीं हूँ ! तीन दिनों सै मेरी आंखों में नींद नहीं है। मैं तुमसे मिलने के लिये बेचैन थी।' "क्यों क्या हुआ ? मैं भी तुमसे मिलने के लिये हर रोज यहाँ खोजता था, पर तुम दिखी नहीं। और कहो, तुम क्यों उदास हो?"
"रंजीत, मेरे पिताजी मेरी शादी कर देना चाहते हैं। पर मैं तुमको चाहती हूँँ। जब से मैंने तुम्हें देखा ,मुझे तुमसे प्यार हो गया है। लगता है जैसे जन्म जन्मों का बंधन हो! कहो रंजीत मुझसे शादी करोगे?" "हाँ,हाँ, मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ ।चलो हम तुम्हारे पीताजी से बात करेंगे।" रंजीत बोला। इस पर मोहनी बोली," रंजीत मेरे पिताजी, बिल्कुल नहीं मानेंगे और मैं तो घर छोड़कर चली आई । " घर छोड़कर चली आई! मैं नहीं मिलता , तो तुम कहाँ जाती इस ढलती शाम के अंधेरे में?" रंजीत चकित होकर पूछा।
"मुझे मालूम था रंजीत,कि तुम आओगे और यहीं आओगे , तभी तो मैं यहाँ इंतजार कर रही हूँ।" रंजीत फिर सिहर गया," तुम्हें यह सब कैसे मालूम? मैं नहीं आता तो किधर जाती?" " अब ज्यादा कुछ मत पूछो ,रंजीत! तुम नहीं आते तो मैं यहीं रह जाती। यही तो मेरा असली घर है, यह जंगल! चलो, जल्दी हम अभी यहीं शादी करते हैं।"
रंजीत कुछ बोलता इसके पहले वह उसका हाथ पकड़कर पासवाले बरगद के पेड़ के पास ले गई। वहाँ जाते ही बरगद के डालों के बीच से दो फूल मालायें उसके हाथ में गिरे। रंजीत कुछ कहता उसके पहले ही वह एक माला उसके गले में डाल दी। दूसरा माला उसके हाथ में देकर अपने गले में पहनाने को बोली। मंत्रमुग्ध -सा रंजीत उसके गले में डाल दिया। उसके मोहिनी कै गले में माला डालते ही कई अस्पष्ट वाणियां बरगद के डालों के बीण गूंजने लगी, मानों सैकड़ों लोग एक साथ बोल रहे हों। रंजीत जड़ सा हो गया। उसकाहाथ पकड़कर मोहिनी कार तक लाई और उसे साइड सीट पर बैठाकर खुद स्टीयरिंग संभाल ली।
बाइस किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय कर पलक झपकते हीकार रंजीत के घर के सामने खड़ी थी।
रंजीत अब पूरी तरह मोहिनी के वश में था। घर के द्वार पर रंजीत को एक सुंदर लड़की के साथ देखकर रंजीत के माँ की आंखें फटी की फटी रह गई। इतनी सुंदर लड़की को उसने जीवन में नहीं देखा था। रंजीत के पिता का भी यही हाल था। दोनों के मुँह से बात नहीं निकल रहा था।रंजीत और मोहिनी बिना किसी रीतिरिवाज के घर के अंदर प्रवेश कर गये।
रंजीत की माँ शोभादेवी बहू को देखकर बड़ी खुश थी। वह खुश क्या थी, उसको तो मोहिनी ने वश में कर रखा था। रंजीत के पिता सूबेदार सिंह भी मोहिनी के वशीकरण में थे। उन दोनों ने मोहिनी को अपनी बेटी की तरह स्वीकार कर लिया।वास्तव में यह मोहिनी के वशीकरण का जादू था। मोहिनी सास ससुर की जी भरकर सेवा करने लगी। वह पति की भी अच्छी सेवा कर रही थी।
मोहिनी दिन भर सबकी सेवा करती और जब रात को शयनकक्ष में पहुंचती तो पता नहीं क्यों रंजीत को जम्हाईयां आने लगती और वह बिलकुल बेहोश- सा सो जाता। यह क्या राज है, पता नहीं। मोहिनी जिस दिन आई उस दिन से कभी पूजागृह में कदम नहीं रखी। रंजीत को घरके अन्य कमरों से भी र भगवान की तस्वीरों को हटवा दिया। घरवालों के पूछने पर यही कहती है कि उसे भगवान में बिलकुल विश्वास नहीं है। जब शोभादेवी सुबह आरती के समय घंटी बजाती ,तो उसे असह्य कष्ट होना और वह अपने कमरे में बंद होकर बैठती। शोभादेवी को यह सब कुछ असामान्य लगता ,पर बहू की सुंदरता और सेवाभाव देखकर कुछ नहीं कहती।
एक दिन मोहिनी रंजीत के खाना परोस रही थी। रंजीत जब उसका चेहरा देखा तो उसका कलेजा धक से रह गया। वह मोहिनी नहीं, सुधा थी। "सुधाsss!" रंजीत के मुँह से चीख निकल गई। "अरे बेटा, मोहिनी को सुधा क्यों पुकार रहे हो?" माँ ने कहा। ",कुछ नहीं माँ।" ,रंजीत बोला। वह.सर उठाकर देखा तो मोहिनी मुस्कुरा रही थी। फिर अपने को संभालकर देखा ,तो सुधा क्रोध से लाल चेहरा लिये खड़ी थी।"माँ, माँssss".कहते रंजीत चीख पड़ा। उसे उठाकर माँ ने चारपाई पर लिटाया और माथे पर भींगी पट्टी रखी। रंजीत बेहोश सा शाम तक पड़ा रहख । अब वह मोहिनी से बुरी तरह डर रहा था।
एक दिन सभी बैठे हुये थे। मोहिनी।रसोई से सबके लिये चाय लाती हुई पैर फिसलकर गिर गई। रंजीत के माता -पिता रंजीत को आवाज लगाई ,"अरे बेटा बहू गिर गई ,उसे उठाओ!",रंजीत दौड़कर जैसे उसे उठाने गया,वैसे ही वह चीख पड़ा-" माँ इसके पैर उल्टे हैं। यह चुडैल है।" रंजीत की चीख सुनकर उसके माता पिता मोहिनी की ओर देखे। चांदी के पाजेब से सजी मोहिनी की दोनों पैर बड़े सुंदर थे। रंजीत को उठाकर पलंग पर लिटा कर उसके माथे पर गीली पट्टी लगाया गया। माँ के कहने पर मोहिनी एक गिलास में गरम दुध लेकर आई। जैसे ही रंजीत दूध का गिलास लेने हाथ बढ़ाया, उसकहाथ से गिलास छूट गया। मोहिनी की हाथ सिर्फ हड्डी थी, मांसपेशियां और चमड़ा था ही नहीं। वह बेहोश हो गया। तुरंत डाक्टर को बुलाया गया। डाक्टर ने इंजेक्शन देकर दवा देकर कहा कि उसे कोई गंभीर मानसिक पीड़ा है। दो दिन के इलाज के बाद वह ठीक हुआ।
रंजीत की माँ शोभादेवी बहुत चिंतित थी। रंजीत का हाल देखकर वह दुखी हो रही थी। किसी ने सताया कि अब नवरात्र आनेवाले हैं,अतः नवरात्र के पहले अमावस्या के दिन कालीबाड़ी के काली माता का दर्शन कर आओ, सब ठीक हो जायेगा। दूसरे ही दिन अमावस्या था। दोपहर के दो बजे शोभादेवी अपने पति , रंजीत और मोहिनी के साथ कालीबाड़ी के लिए निकल पड़े। रंजीत की तबीयत ठीक न होने के किरण मोहिनी ही ड्राइविंग सीट पर बैठी और रंजीत को बगल में बिठाया। कार की पिछली सीट पर शोभादेवी और उसके पति बैठे थे। शाम पांच बजे वे कालीबाड़ी के करीब पहुंच रहे थे। जैसे ही वे झरने के पास पहुंचे कार ठप्प से रुक गई। रंजीत और मोहिनी कार से उतर पड़े। रंजीत कार के इंजन आदि चेक कर रहा था। मोहिनी भी बगल में खड़ी उसे औजार आदि देते हुये मदद कर रही थी। शोभादेवी और उसके पति भी कार से उतरकर खड़े थे। रंजीत ठीक झरने वाली ओर एक बड़े पत्थर परखड़े होकर झुककर कार के ईंजन को स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था। उसने पुकारा - "मोहिनी , जरा बड़ावाला स्क्रूड्राइवर देना तो।" "लीजिए",कहते हुये हाथ बढ़ाई। जैसे ही स्क्रूड्राइवर लेने रंजीत ने हाथ बढ़ाते हुये सर उठाया, उसका दिल धक्.से रह गया। सामने मोहिनी नहीं सुधा खड़ी थी। उसके आंखों से अंगारे फूट रहे थे। रंजीत जिस पत्थर पर खड़ा था, वह वही पत्थर था ,जिस पर.सुधा और रंजीत उस काली रात को बैठे थे, जहां से रंजीत उसे झरने में ढकेल दिया था। मोहिनी के बढ़े हुये हाथ में लंबे लंबे नाखून उभर आये थे। घबराकर रंजीत पत्थर पर खड़े मोहिनी के पैरों की ओर देखा। उसके दौनों पैर पीछे की ओर मुड़े हुये थे। उसके उल्टे पैर देखकर रंजीत कांपने लगा। " मोहिनीsss" ,वह जोर से चीखा, पर उसकी आवाज गले से नहीं निकल रहा था। देखते ही देखते मोहिनी का सुधा वाला चेहरा भी बदल गया । उसके चेहरे पर लाल लाल आंखें , भयंकर लंबे दांत उभर आये। काला चेहरा औरबिखरे हुये केश तथा हाथ के उंगलियों में लंबे नाखून और उल्टे पैरों से एक भयंकर चुड़ैल सामने खड़ी थी। यह सब चंद मिनटों में हो गया। उसने कार की ओर अफनी पैनी आंखों से देखा। कार धू धू कर जल उठा। उसने हाथ बढ़ाकर रंजीत का गला पकड़ लिया। उसके गले से खून के फव्वारे छूटने लगे। वह.गरजकर रंजीत से पूछी-" रंजीत, कुछ याद आया? मैं सुधा हूँ ।" रंजीत गिड़गिड़ाने लगा- " सुधा, मुझे माफ कर दो, सुधा मुझे माफ कर दो।"
सुधा ने अट्टहास कर हँसी और गरजकर बोली-" तुमने मुझसे शादी का वादा कर धोखा दिया, इसलिये मैंने तब नहीं तो अव चुड़ैल बनकर शादी की। तब तुमने मुझे इसी पत्थर पर से झरने में ढकेला, अब मैं तुझे ढकेलती हूँ!" कहकर उसने रंजीत के पीठ पर एक जोरदार मुक्का मारा।
खून की उल्टियाँ करते हुये बीसियों चक्कर खाते हुये भयानक चीख के साथ रंजीत उस अगाध झरने में गिर पड़ा। चुड़ैल देखते ही देखते भस्म हो.गई। सुधा ने रंजीत से अपना बदला ले लिया।
इस घटना को बरसों बीत गये। अभी वह गेस्ट हाउस और झरना भुतहा कहे जाते हैं। शाम के छह.बजते ही लोग वहाँ से निकल जाते हैं।लोग कहते हैं कि हर अमावस्या के दिन उस गेस्ट हाउस से रोने की आवाज आती है और झरने में किसी भारी चीज के गिरने जैसी छपाक छपाक आवाज आती है।
--पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(इस कहानी में वर्णित पात्र,स्थान ,घटनायें सभी कल्पित हैं। अगर कुछ मिलते जुलते हैं तो वह मात्रसंयोग ही है।)
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)

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