जब थे बच्चे 
उपहार मन को भाते 
थोड़े बड़े हुए 
तो मीठे बोल सुहाते 
युवा हुए तो नयनों की भाषा भायी 
और उम्र बढ़ी तो 
बच्चों की खुशी में खुश होते 
धीरे धीरे उम्र ढ़लने लगी 
मगर रोज बनते नए नए लक्ष्य 
नयी नयी राहो पर चलने की चाह 
अब यही उमंग यही तरंग यही चाह 
पतंग की तरह डोर से बंधे उड़ते उड़ते 
वो दिन भी आएगा 
जब हँसते हँसाते अलविदा होंगे 
याद फिर भी हम आएँगे मुस्कुराते मुस्कराते


         अंजू