नही हूँ मैं किसी की जागीर
बस एक औरत हूँ मैं!
नही बनना मुझे किसी के हाथों की कठपुतली
बस एक औरत हूँ मैं!
नही देना किसी को भी इतना हक
कोई भी आए और जज्बातों से खेले
नही बनना मुझे किसी के हाथों का खिलौना
मुझे तोड़कर किसी ओर खिलौने का हो ले!
मैं कोई भोग की वस्तु नही हूँ
मैं भी एक इंसान हूँ तू समंझ ऐ घमंडी पुरुष
मैं कोई बाजार में लगी तस्वीर नही
जो कोई भी आए और गलत निगाहों से देखे
मुझे हक है मैं भी जियूँ अपनी जिंदगी
नही चलना चाहती पुरुषों के बनाए नियमों पर
मुझे हक है हर कही घूमने का
ये देश जितना तेरा है उतना मेरा भी है ओ पुरूष
तुम इतने गिर गए,बच्चियों को भी हम घरों में बंद करने लगे
अब जवानी में तो क्या बुढ़ापे में भी हम डरने लगे
तुम्हारी तो हर गाली को भी हम औरतें ही झेलती है
नही कसूर हमारा फिर भी हर गाली में औरत ही होती है
क्यों जाकर बेटों के फोन नही देखते तुम
क्यों हर पाबंदी बेटियों पर ही लगाते हो
क्यों बेटों के फ़ोन से लड़कियों के नम्बर नही हटाते
क्यों हर बार बेटियों को ही सुनाते हो
क्यों हम सुने के हमे अगले घर जाना है
क्यों बेटों को ये नही कहते तुम्हे भी तो कमाना है
क्यों नियमों में हमको बाँध रहे हो
क्यों पंख हमारे काट रहे हो
ओ नारी तू भी जाग जा अब
अपनी शक्ति को पहचान जा अब
तूने ही जन्म दिया है इस पुरुष
वक्त आ गया है दुर्गा बनकर शस्त्र उठा अब
नही वक्त बचा सजने सँवरने का अब
अब सुंदरता को अपनी शस्त्रों से सजा
मत लुभा किसी को अपनी सुन्दरता से
बस काली का रूप तू पा!
हर नारी को समर्पित
जय माता की
🙏🙏🙏🙏🙏
कोमल भलेश्वर
हरियाणा

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