जर्रे जर्रे में तस्वीर जब तेरी बनी है हे ईश्वर ।
फिर क्यु फिसलती जा रही हाथ से ।
काली रेत सी ज़िन्दगी।
पल पल तेरे नाम के सिमरन में भी ।
क्यु बंधती नहीं कोई आस ।
तेरा साथ जब है मेरे आस पास।
तो मुँह से क्यु निकले ये काश।
कांप जाता है हृदय मेरा।
देख स्थिति आज।
मानव है कमजोर ।
चल रहा ना कोई ज़ोर ।
काली अंधेरी का साया।
करोना जैसा घातक रोग।
नहीं जाने को तैयार।
काली रेत में दब रहे है काले बन तन।
ना कोई किर्या कर्म हो रहा ।
ना आखिरी बार दर्शन ।
कितनी दुर्गति हो रही इंसा की।
एक के ऊपर एक पड़ी है लाश ।
दर्द भरी आह भी निकलना भूल गयी।
देखकर देश विदेश में इंसानियत के हालात।
नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया )🌹🌹
दिल्ली

0 टिप्पणियाँ