याद आतीं हैं उन गाँव की गलियां
आज जहाँ... 
बीता था बचपन जहाँ... 
न कोई गम़ न कोई चिंता थी
जहाँ.... 
खुशियां से भरा जीवन बीता था
जहाँ.... 
पीपल के पेड़ पर पड़ते थे झूले पड़ते
थे जहाँ... 
ठंडी ठंडी पुरवाईया में पेगें ली थी
जहाँ.... 
शाम को चौपाल पर गप्पे होतीं थीं
जहाँ... 
मिट्टी के घरों में सोंधी सोंधी सी खुश्बू
थीं जहाँ... 
कल कल करतीं नदियाँ बहती नज़र आतीं
थी जहाँ... 
उसी गाँव को ढूंढता है आज शहर में
यहाँ....! 



     मनु की ✍🏻से