तुम जो रूठ कर, मेरा हौसला तोड़ती हो, तुम नहीं जानती अंदर से कितना टूट चुका हूं में...

सिसक सी सिसकियां, बनावटी हंसी में छुपाता रहा ,हर दम बहुत खुश हूं में ,बस यही लगता है तुम्हें...

बहुत सी खामोशी ,मेरे अंदर छुपी रही ,बहुत सा समुंदर ,तुम समझती हो बहुत प्यासा रहा हूं में...

त्याग की भावना में सबको देता गया, तुम समझती रही बहुत लूट चुका हूं में...

मेरे जज्बात ,मेरे एहसास बस एक जिंदा लाश रहे ,तुम समझती रही ,में अंदर ही अंदर मर चुका हूं में...

बस मेरे एहसास, बस मेरी पीड़ा को समझा ,मेरी एक ही टूटी कलम ने ,तुम समझती रही फालतू लिखता रहा हूं में...

मेरे ऊपर है बहुत सी जिम्मेदारी ,वरना इस दुनियादारी से आजाद रहा हूं में...

बस तेरे मन के मुताबिक नहीं ,ढल सकता आज और कभी तुम समझती रही पागल बन चुका हूं में...

रो देना हमें नहीं आता, वरना तमाशा करने का मदारी बना होता में...


मेरी असलियत का खूब मजाक उड़ाती रही तुम, बस सच्चाई जब-जब कहता और सुनता रहा हूं में...

तुम खुश नसीब बहुत होगी, अपना रास्ता पाकर में तो भूल भुलैया में भटकता रहा हूं में...

सबसे बुरा में ही रहा दोस्त ,बस अकेले ही अकेले बहुत सीखता भूलता रहा हूं में...

मन तो मेरा भी अखरता है कोई होता अपना ,तुम सब होकर भी अकेले रहा हूं में...

हां अभी हालात के कारण ,तुम्हारे अनुसार स्टेटस नहीं बना पाया
धूल था और धूल में मिलता रहा हूं में...

तेरी एक मुस्कान पर मुस्कुराता रहा हरदम ,तुम जो नाराज रही तो नाराज रहा हूं में...

बस हौसला रखने सहने का अनुभवी ही जाना,
तुम तोड़ती रही और टूटता बिखरता रहा हूं में...

प्यार और दिल हमारा भी था ,कभी बस समुंदर की लहरों में अतीत को देखता रहा हूं में...

मेरे आंसू ही समझते हैं, मेरी जुबानी कलम की भाषा,
बेझिझक संवाद चुपचाप करता रहा हूं में...

किसी का बेरी हूं और बेर बढ़ाता गया ,हर पल- हर-क्षण
पत्थर पर अमिट लकीर उकेरता गया हूं में...

तुम्हें बस तुम्हारा सब कुछ मुबारक, जो भी और लेना बस देता गया हूं में...

कलम बस मरने तक मेरा साथ देती रहना,
बस अंतिम उम्मीद कह रहा हूं में...

टूटा ही सही वाद संवाद करता रहा ,अंतर्मन से
बस कहना बहुत बस ,यही कहता लिखता रहा हूं में...

में में कुछ भी नहीं तुम ही तुम सब कुछ, बस इतना ही कहूंगा में...

मृत्युशैया पर कलम तुम साथ नहीं छोड़ना हमारा,
अगले जन्म में भी लिखूंगा ,यही अंतिम अभिलाषा करता रहूंगा में...

✍️लक्ष्मीनारायण
मन के भाव स्वरचित कलम से