अपनापन तो सब दिखाते है
पर कौन है अपना ये तो हालात बताते है।
चलते चलते थक गई हूं
दूर निकलना छोड़ दिया है
ऐसा नहीं है कि मैने चलना छोड़ दिया है।
फासले से दूरियां बड़ गई है
पर ऐसा नहीं कि हमने रिश्ता
निभाना छोड़ दिया है।
आज भी याद और परवाह
करती हूं सबकी
पर ये बताना छोड़ दिया है
हां अकेली हूं इस दुनिया
की भीड़ में,पर ऐसा नहीं है
कि अपनो से मिलना छोड़ दिया है।
गुजर रही हूं उन यादों से
जिसमें बचपन बीता है
आज भी अपनेपन की खुशबू है
जो आज मेरी कविता है।
हरप्रीत कौर

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