शादी के दिन ।
ढोलो की थाप।
वो रंगीन झिलमिलता।
सा वो आँगन।
वो चंद कदमों ।
की दूरिया।
वो चंद फासले ।
अमिट से रिश्ते।
सब बेपरवाह हो गये।
जब उसने मुझको देखा।
हाँ मुझको!
श्वेत वस्त्रों में ।
थोड़ी शर्मायी सी।
थोड़ी सकुचायी सी।
एक टक मुझको देखना।
फिर दिल मे उतरना ।
मेरा साया बनके चलना ।
मुस्कुराना सब बड़ा हसीन था।
आखिर शादी का वो खास दिन था।
मै कहीं भी जाऊँ।
ओट लेकर तकना ।
साथ बैठी लड़की से कुछ कहना ।
और मंडप तक जाना ।
मुझे देख मुस्कुराना ।
दोनों के हरकते बड़े बदमाश थे ।
सच कहूँ वो शादी वाले दिन खास थे।
जाते जाते बार बार ।
उठना और बैठना ।
रूकने कि लाख कोशिशें करना ।
और शायद बिछुडने का दर्द ।
तुझमे भी बेहिसाब है ।
शादी वाला दिन है और पहली मुलाकात है।
सीढ़ियों से उतरते कदमो का
बार बार डगमगाना।
आखो को निचेकर अश्रु से बचाना।
आखो का न मिलाना ।
मिलने पर कही भीग न जाऐ हर जमाना।
उसकी आखो के अश्रु मे वो बात है।
शादी की वो रात है ।
और आखिरी मुलाकात है।
आह भर रूकते हुए।
कदमों का चलना ।
आसमा मे यु बादलों का भड़कना।
वो आखो ही आखो मे ।
आखिरी प्रणाम निवेदित करना ।
गाड़ियों तक पहुँचना ।
लगता हजारों साल है ।
शादी वाला दिन है।
और आखिरी मुलाकात है।
अनमने रूप से गाड़ी मैं बैठना ।
आए थे आगे अब पीछे दुबकना।
वो बार बार द्वार की ओर देखना।
और उदास हो जाना ।
अब बिछुडने की बात है।
शादी वाली रात है ।
और आखिरी मुलाकात है।
सर्वेन्द्र मिश्र

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