राघव हाथ में पत्र लिए सिर पकड़ कर बैठ गया । यह पत्र उसकी पत्नी सीमा का था जिसमें लिखा था......
राघव,
मैं तुम्हें पत्र के साथ मेडिकल रिपोर्ट भेज रही हूं । इसमें साफ लिखा है कि इस बच्चे के पिता तुम हो । ये रिपोर्ट मेरी अग्निपरीक्षा है जो मैंने पार की है ।
राघव, मैं सीता नहीं जो अग्निपरीक्षा भी दे, त्यागी भी जाए और फिर आत्महत्या भी कर ले ।
तुम मेरी हर बात को शक की नजर से देखते हो । मुझे किसी से बात तक नहीं करने देते, किसी आदमी से तो दूर औरत से भी नहीं । हर बात पर रोक टोक, अकेले बाहर तक भी निकलने नहीं देते ।
मुझे फिर भी कोई परेशानी नहीं थी । मैंने सब स्वीकार करके ऐसे ही जीना मंजूर कर लिया । क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करती हूं। मुझे लगता था तुम मुझे इतना प्यार करते हो कि अपने से दूर होने की कल्पना से ऐसा व्यवहार करते हो । मैंने परिस्थितियों से समझौता कर लिया । मैं अपने में ही सिमट गई । ताकि घर में शांति रहे और तुम खुश रहो । तुम्हें लगता है तुम ही सही हो और जो कर रहे हो बिल्कुल ठीक कर रहे हो ।
पर अब और नहीं, तुमने मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई
है । तुमने एक औरत, पत्नी और मां का अपमान किया है ।
तुमने सभी हदें तोड़ दी । अब मैं और सहन नहीं कर सकती ।
मैं तुमसे प्यार के साथ साथ थोड़ा सम्मान चाहती थी, पर तुमने मेरा भ्रम तोड़ दिया ।
दो साल की शादी के बाद भी तुम मेरी आंखों की सच्चाई नहीं पढ़ सके । ये बताने पर कि मैं मां बनने वाली हूं तुमने मुझे जांच करवाने के लिए कहा । मैंने सोचा लड़का है या लड़की तुम ये जानना चाहते हो । पर तुम्हारा मतलब तो कुछ और था । वैसे मैं वो जांच भी नहीं करवाती । तुम्हें अपने आप पर भरोसा नहीं , और इल्जाम मुझ पर लगा दिया ।
ऐसा नहीं कि मैंने तुम्हें ये सब बताया न हो, समझाया न हो पर तुम कुछ भी सुनने और समझने को तैयार ही नहीं थे ।
अब मैं जा रही हूं और तुम्हारा साया इस बच्चे पर कभी नहीं पड़ेगा ।
मैं चाहती तो बिना टेस्ट करवाए ही चली जाती ।पर तुम अपने शक की आदत की वजह से इसी भ्रम में रहते कि मैं ही गलत थी । अब ये रिपोर्ट तुम्हारे गाल पर तमाचा है । ये तुम्हें एहसास कराएगी कि तुम हमेशा ही गलत थे ।
सीमा
राघव रिपोर्ट और पत्र हाथ में लिए रोने लगा । अब पछताने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकता । उसने अपने ही हाथों अपना घर उजाड़ लिया था ।
धनु दयाल

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