रक्षाबंधन के दिन दीदी का फ़ोन आया । "छोटी तुम अभी तक घर से निकली नहीं, हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं ।"
मैने कहा " नहीं , दीदी मैं नहीं आ रही । मेरा इस सब में कोई विश्वास नहीं रहा ।"
"अरे , क्या हुआ ? ऐसा क्यों कह रही हो ?" दीदी ने आश्चर्य से कहा ।
मैंने रुआंसे होते हुए कहा " नहीं दीदी ये राखी बांधने से कुछ नहीं होता । अगर होता तो चार बहनों के होते हुए हमारा इकलौता भाई इस दुनिया से असमय थोड़ी न जाता । राखी तो इसीलिए बांधते है न कि भाई की उम्र लंबी हो ।"
दीदी ने दुलारते हुए कहा "ऐसा नहीं कहते पगली, भाभी और दोनों भतीजों के बारे में सोचो जिन्हें तुम्हारा इंतजार है । भाई के जाने के बाद तुम ऐसा करोगी तो उन्हें कितना दुःख होगा । हमें अपनों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुचानी चाहिए । अब भाभी और ये दोनों बच्चे ही हमारे भाई है ।
और फिर भाई बहन का प्यार रेशमी धागों का मोहताज नहीं है। ये तो वो स्नेह का धागा है जो हम सब के बीच है । हम लोग बच्चे से बड़े और बड़े से बूढ़े होने लगे हैं पर हम सब का प्यार बना हुआ है । यह सिर्फ एक दिन राखी बांधने से नहीं है।
हम जब भाई को याद कर लेते हैं हमारा रक्षाबंधन का त्यौहार उसी समय हो जाता है । छोटी, तुम भाभी को क्यों भूलती हो,जो सुख दुःख में हमेशा हमारे साथ होती है । इस समय उन्हें हमारी जरूरत है ।
आज के दिन हम सब पहले की तरह ही इकठ्ठे होंगे तो भाभी और बच्चों को अच्छा लगेगा ।
अरे, सुन रही है न बोलती क्यों नहीं ।"
"हां , दीदी आप ठीक कह रही हैं । मैं सिर्फ अपने बारे में ही सोच रही थी । मैं अभी आती हूं ।"
फोन रखकर मैं मायके जाने की तैयारी करने लगी। मेरे दिल से एक बोझ हट गया था । मेरा भ्रम टूट चुका था ।
धनु दयाल

0 टिप्पणियाँ