ज़िन्दगी छुपा छुपी का खेल है।
कभी हस कर आँसु छिपाते है।
कभी मुँह फेरकर गम से।
नाता टुटा हुआ दिखाते है।
लेकिन ये बेवफ़ा आँखे।
बहुत बदतमीज है।
चुपके से सारी पोल खोल जाती है।
इंसान छुपाए तो कैसे छुपाए।
अपनी रुसवाईयाँ।
शातिर ज़माना बहुत है।
हर आहट पहचान लेता है।
डगमगाए कदमों से ही।
दिल का हाल जान लेता है।
मायूस पड़ा दिल तड़प कर
गमों का बादल बन ।
कभी भी बरस जाता है।
ठंडी ठंडी फुहार में भी।
अंगार सा जलना बता जाता हैं।
ना मौसम का जादू चलें।
ना पुरवाईयों का ज़ोर।
मजबूर दिल के हाथों से।
झटक कर रह है जाता हर बार
कितना भी पूछों तन्हाइयों से सवाल।
जबाब कहाँ देती है बन हमारी मदहोशी।
दिशाहीन करती है अनभिज्ञ हमें जान।
विरह का पाठ पढ़ाती है ये मुकतड़प हर बार।
नीलम गुप्ता🌹🌹 (नजरिया )🌹🌹
दिल्ली

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