"माँ मैं,परी हूँ
माँ के आँचल में छुप जाऊँ,
पिता के कांधे लटक जाऊँ,
दादा दादी के गोद में बैठकर,
राजा-रानी की सुनूँ कहानी।
मैं चिड़िया तेरे आँगन की।
घर आँगन महकाऊँ।
मैं परी हूँ इस धरा की
खुशियों की बहार लाऊँ।
माँ गर्व करो तुम मुझ पर,
अपने गले से लगाओ।
तुम चिंता मत करना,
मैं खुद अपनी पहचान बनाऊँ।
तेरे दूध का कर्ज चुकाऊँ।
तेरा मान कभी ना घटाऊँ।
तेरे नाम का परचम
इस धरा पर लहराऊँ।
कभी लक्ष्मी कभी दूर्गा
कभी काली बन जाऊँ।
वक्त पड़े तो महिषासुर को,
उसकी औकात बताऊँ।
मैं ही हूँ उस युग की सीता।
समाज के खातिर,
राम ने जिसे वनवास दिया।
राज्य की खुशहाली में,
आदर्शों का ज्ञान दिया।
राम जानकी खुद को ही,
विरह की आग में डाल दिया।
मैं ही हूँ उस युग की राधा,
कृष्ण ने जिसे विरह की आग दी।
प्रेम को सबसे ऊंचा स्थान दिया।
मैं ही हूँ उस युग की मीरा
जिसने भक्ति की शक्ति।
संसार को दिखला दिया।
में ही बनूं इस युग की दूर्गा।
अपनी शक्ति अपने पास रखूँ।
लक्ष्मी बन धरा पर मोती बन छा जाऊँ
मंद-मंद मुसकाऊँ, मुश्किल से टकराऊँ
खुशियों की तरंग बन जाऊँ।
जीवय का अंधकार मिटाऊँ।
जीवन संघर्ष पथ पर,
आगे कदम बढ़ाऊँ।।
ना डर कर ना झुक कर,
सम्मान के साथ डटकर,
इस धरा का मान बढ़ाऊँ।।"
अम्बिका झा ✍️

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