महेश जी -( मन ही मन) छह बजने को जा रहे हैं ,  पार्क आने में अरुंधति आज इतनी देर क्यों लगा रही है?
पिंकी -  यह अरुंधति कौन है दादाजी ? आप किसके आने की बात कर रहे हैं? आप अपने आप से क्यों बातें कर रहे हैं?
महेशजी- कुछ नहीं, यूँ ही कुछ बोल रहा था।( मन में) तो मेरे मन की बात बाहर आ गई!
पिंकी- बताइये न दादाजी!
(इतने में अरुंधति पोते के साथ आती है)
महेश जी - आइये, अरुंधति जी! इतनी देर कर दी तो मैं सोचा कि शायद मुझसे कोई भूल हो गई हो और आप नाराज होकर नहीं आने की ठान ली हो!
अरुंधति- जी नहीं! घर पर कुछ मेहमान आ गये थे। बहू स्कूल से साढ़े चार बजे आई थी। मेहमानों के लिए चाय नाश्ता बनाने में देर हो गई।
पिंकी - तो ये हैं, अरुंधति! आप इनकी बात कर रहे थे!
महेशजी - चलो बेटा, जाओ,तुम रोहन के साथ खेलो। अंधेरा हो रहा है। जल्दी खेल के आ जाना।
अरुंधति - (बेंच पर महेशजी से कुछ दूरी पर बैठते हुए) तो क्या मेरे आने का इंतजार हो रहा था?
महेश जी -  हाँ , यूँ ही मन ही मन कुछ बोल रहा था ,तो शायद बात बाहर सुनाई पड़ गई होगी। मैं कह रहा था कि छह बजने जा रहा है ,आप अभी तक नहीं आई।
अरुंधति - ( खुशी से)जब मन की बात अनजाने में बाहर सुनाई दे, तो वह मन की आवाज़ होती है।लगता है आप मेरी बहुत चिंता कर रहे हैं।
महेश जी - हाँ, वाकई चिंता हो रही थी । कल आपने बताया नहीं था कि आप क्यों दुखी थे।
अरुंधति - ( चेहरा उदास हो जाता है) जी, कुछ नहीं!
महेशजी - नहीं अरुंधति जी! जरूर कोई बात है, बताइये ना?  क्या आपको मुझ पर विश्वास नहीं है? मेरी आंखों में झांककर देखिये, क्या मुझमें शराफत नहीं है? बोलिए अरुंधति जी! आप अपनी बात निश्चिंत होकर बतायें! हो सकता है कि मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूं।(एक लंबी सांस लेकर आसमान की ओर ताकते  रहते हैं।)
अरुंधति- जी, कल मेरी तबियत जरा ठीक नहीं थी। सर में तेज दर्द था। शाम को बहू के स्कूल से  आने पर चाय देने में देर हो गई थी, बस उसने भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। इससे मेरा मन दुखी हो गया। फिर इस पोते को लेकर घुमा लाने को कही ,तो मैं उसे लेकर रोज की तरह पार्क आयी।
महेश जी - ओह ! याने कि आपकी  बहू आपसे  झगड़ती और बदतमीजी करती है। और आपको उसे चाय बनाकर देना पड़ता है?
अरुंधति - नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। बहू स्कूल जाती है और उसकी भी अपनी जिम्मेदारियों का बोझ है। कभी- कभी  उसे थोड़ा गुस्सा आ जाता है।
महेशजी - नहीं,ऐसी बात नहीं हो सकती! मुझे सब समझ में आ गया है। वैसे आपने अपने बारे में कुछ  बताया नहीं है।
अरूंधति-  जी, मेरा कुछ खास नहीं है कहने को। मैंने हिंदी  में  एम. ए.की और यहीं एक प्राइवेट कालेज में पढ़ाती थी।  जब तक रामू के पिता जीवित थे , तब तक सब ठीक चल रहा था। घर में नौकर चाकर थे। मैं और बहू अलका अपने अपने काम पर जाते थे। बाप बेटा भी अपने अपने काम पर व्यस्त रहते थे। शाम तकसब घर पर आ जाते थे और अच्छी चहल-पहल रहती थी। नौकर खाना बनाते थे। रसोई की सारी जिम्मेदारी उनकी थी। रोहन की देखभाल करना भी उनका ही काम था। बड़ा खुशहाल परिवार था। मैं अपने परिवार पर बहुत गर्व करती थी।  पर दो साल पहले उनके चले जाने पर सारी दुनियां ही बदल गई। बहू रोज किसी न किसी बात पर झगड़ती रहती।बेटे ने एक एक करके सभी नौकरों को छुड़ा दिया। अब घर का सारा काम और रसोई का कम मुझे करना पड़ता था। अब इतना काम करके कालेज नहीं जा पाती थी। मेरा बेटा रोज मुझे  नौकरी छोड़ने को कहता। आखिरकार मैंने नौकरी छोड़ दी और घर के काम और रसोई संभालने लगी ,फिर भी मेरे बेटे और बहू खुश नहीं। एक मेरा पोता रोहन ही है, जिसके चलते मेरा मन बहल जाता है। (अरुंधति अपने पल्लू से आंखें पोंछती है।)
महेश जी-ओह, तो यह बात है! आपने अपने दिल में इतना  ज्वालामुखी समा रखा है और बात कुछ नहीं कहते रहे। आप चिंता मत कीजिए, सब ठीक कर दूंगा।
रोहन - ( दौड़कर आता है) चलो दादी! घर चलो ना !
अरुंधति -  जी, मैं चलती हूँ, नहीं तो देर हो जायेगी।
महेशजी - जी ,कल का इंतजार रहेगा!


                                       (शेष अगले भाग में)