भारतीय इतिहास में कई ऐसे पात्र और कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिसने इसके भविष्य का निर्माण किया है किन्तु अफसोस ! इतिहास ने उन पात्रों के साथ न्याय नहीं किया यहाॅं तक कि उनके बारे में कम लिखा और पढ़ा गया । उन पात्रों का जिक्र केवल किदवंत कथा तक ही सिमट कर रह गई । 

      आज मैं इतिहास के एक ऐसे ही पात्र का जिक्र करने जा रही हूॅं । मैं इतिहास के जिस पात्र की चर्चा आज करने जा रही हूॅं उसका नाम है " आम्रपाली "


  आम्रपाली जिसे वैशाली के " नगरवधू " के नाम से भी जाना जाता है । विश्व की प्रथम गणतांत्रिक राज्य होने का श्रेय वैशाली अर्थात लिच्छवी गणराज्य को प्राप्त हैं । सबसे पहले प्रजातंत्र की नींव इसी राज्य में पड़ी थी । लिच्छवी गणराज्य में ही एक बहुत ही सुन्दर नृत्यांगना औ नायिका का वर्णन मिलता है जिसका नाम आम्रपाली था । 

सृष्टि के निर्माण के समय से ही सौंदर्य आकर्षक का केन्द्र रहा है । किसी - किसी के लिए तों यह सौंदर्य ईश्वरीय वरदान या पुरस्कार के समान होता है परन्तु किसी और के लिए यही सौंदर्य अभिशाप भी साबित होता है । ऐसा ही कुछ हुआ था हमारी इस कहानी की नायिका आम्रपाली के साथ । 

इतिहास की सबसे खुबसूरत महिलाओं में शुमार आम्रपाली बेहद खूबसूरत थी जो भी उसे देखता पहली नजर में ही उसकी खुबसूरती का कायल हो जाता । बढ़ती उम्र के साथ-साथ उसकी खुबसूरती की चर्चा पूरे लिच्छवी गणराज्य में होने लगी । राजा , महाराजा , सेठ , साहुकार सभी उसे पाने का स्वप्न देखने लगें । आम्रपाली को पाने की कामना लिए सभी उसके दीवाने होने लगें । एक समय ऐसा आया कि आम्रपाली किसकी होगी यह जानने के लिए एक नगर सभा का आयोजन किया गया किन्तु इस सभा में भी कोई निर्णय नहीं हो सका क्योंकि सभी आम्रपाली को पाने की चाहत में एक-दूसरे से लड़ने लगें । 

बात इतनी बढ़ गई कि नगर के सभी प्रभावशाली लोग एक-दूसरे को मरने - मारने पर उतारू हो गए । 
गृह कलह की आहट को देखते हुए सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि आम्रपाली किसी एक की नहीं हो सकती अतः उचित यही होगा कि उसे " नगरवधू " 
बना दिया जाएं । 

वास्तव में उस समय नगरवधू का पद राज प्रसाद के किसी मंत्री के समान ही होता था । उसे मंत्रिमंडल में अपनी बात रखने का अधिकार भी प्राप्त होता था । 
सर्वसम्मति से आम्रपाली को लिच्छवी गणराज्य की नगरवधू बना दिया गया और सारें अधिकार दे दिए गए । 


राजवैभव का सुख प्राप्त होने के बावजूद भी आम्रपाली का जीवन अधूरा ही रहा । उसे अपनी पसंद से अपने लिए वर ( पति ) चुनने और अपने अनुसार जीवन व्यतीत करने तक का व्यक्तिगत अधिकार छीन लिया गया । कई विद्वानों ने उस नगरवधू को  वैश्या समान तक कहा है परन्तु इसका कोई सटीक प्रमाण नहीं मिलता है कि आम्रपाली जिसे राज प्रसाद में मंत्री के बराबर पद प्राप्त था उसे वैश्या जैसे घृणित कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता और वह मान जाती । 


खैर ! आम्रपाली राजपद पाकर भी खुश नहीं थी । सारा वैभव उसे वह आंतरिक खुशी नहीं दे पाता जिसकी वह तलाश कर रही थी । सुख - सुविधाओं के सभी संसाधन प्राप्त होने के बाद भी वह दुखी रहती थी मानो उसका सौन्दर्य उसके जीवन पर भारी पड़ रहा हो । 

यह वह समय था जब महात्मा बुद्ध की विचारधारा पूरे भारत में लोगों के लिए सत्य को पाने के समान थी । बुद्ध की विचारधारा वैशाली में भी फैलने लगी इसी क्रम में बुद्ध अपने शिष्यों के साथ  वैशाली  आए  हुए थे । सभी बौद्ध भिक्षु नगर में भिक्षाटन कर जीवनयापन करते थे । नगरवासी भिक्षुओं को भिक्षा देना पुण्य का कार्य समझते थे । भिक्षुओं के प्रति नगरवासियों में सम्मान की भावना थी । 

एक दिन एक सुंदर सा भिक्षु आम्रपाली के महल में भिक्षा माॅंगने गया । उस भिक्षु की सुंदरता और उसकी सादगी देखकर आम्रपाली उस बौद्ध भिक्षु पर मोहित हो गई । जिस आम्रपाली को पाने के लिए राजे - महाराजे , बड़े - बड़े सेठ और साहुकार तरसते थे वह आम्रपाली एक भिक्षु के समक्ष मन से स्वयं को समर्पित कर बैठी । 

आम्रपाली ने उस बौद्ध भिक्षु के समक्ष अपना प्रेम प्रस्ताव रखा तथा उसे अपने महल में अपने साथ रहने का निवेदन करने लगी । वह बौद्ध भिक्षु अपने गुरु की आज्ञा से ही कहीं भी आता - जाता था इसलिए वह अपने गुरु महात्मा बुद्ध की शरण में गया और उन्हें आम्रपाली द्वारा किए गए निवेदन को बतलाया । 

जब यह बात महात्मा बुद्ध को पता चली तो उन्होंने अपने उस शिष्य को आम्रपाली के महल में उसके साथ रहने की आज्ञा दे दी । अब आम्रपाली बहुत खुश थी । यह प्रथम क्षण था जब वह अपने मन के अनुरूप कोई कार्य करने जा रही थी । 


आम्रपाली बौद्ध भिक्षु के साथ महल में रहने लगी । भिन्न-भिन्न प्रकार के जतन कर वह भिक्षु को रिझाने का प्रयत्न करती किंतु वह बौद्ध भिक्षु अपनी तपस्या और ज्ञान के मार्ग से टस से मस नहीं हुआ । वह अपने मार्ग पर अटल रहा । 

वह बौद्ध भिक्षु सौंदर्य को एक छलावा के अलावा कुछ न समझता था । धीरे - धीरे उसके साथ रहते आम्रपाली भी इस सत्य को समझने लगी । यह सौंदर्य , यह राज प्रसाद सब क्षणिक है । यह छलावा के सिवा कुछ नहीं है और यह सुख वास्तविक सुख नहीं है यह सब जान सत्य की तलाश में स्वयं ही महात्मा बुद्ध के समक्ष गई और स्वयं को उनकी शिष्या के रूप में समर्पित कर दिया । 

महात्मा बुद्ध अपने धम्मसंघ में नारियों के प्रवेश को वर्जित मानते थे किन्तु आम्रपाली की मन की विरक्ति और उसके त्याग से प्रभावित होकर उन्होंने उसे अपनी शिष्या बना लिया था इसतरह आम्रपाली सत्य की खोज में सारी सुख-सुविधाओ का त्याग कर तपस्वनी बन बौद्ध की विचारधारा पर चलने लगी । 

                गुॅंजन कमल

                                    धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻