सृष्टि ने अपने पापा से पहले चाचा जी से बात करने की सोची और उन्हें आकाश के बारे में सब बता दिया । यश ने आज ही यह बात भैया से करने का वादा किया ।
जब यश, हर्षवर्धन के पास पहुंचा उस समय हर्षवर्धन किसी सोच में डूबा हुआ था, यश को देखकर अपने पास बुलाया और कहा -
हर्षवर्धन : मैं आकाश के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहता हूं । अभी मुझे कुछ काम है, मैं बाहर जा रहा हूं । तुम सृष्टि का ध्यान रखना ।
यह सुनकर यश ने सृष्टि और आकाश के बारे में कोई बात नहीं की ।
हर्षवर्धन अपनी सोच में डूबे गाड़ी चला रहे थे । उन्होंने दो जासूस लगाए थे आकाश के पीछे । जिन्होंने बताया, आकाश एक अच्छा लड़का है । उसका अपना बिजनेस है और वह बिल्कुल अकेला है । यह सब ही चाहिए था उन्हें लड़के में, जो वह सृष्टि के लिए चाहते थे । लेकिन आकाश की शक्ल से उन्हें कोई याद आ रहा था इसीलिए वे बेचैन थे । अपने शक को दूर करने के लिए आज वे खुद आकाश से मिलने निकल पड़े ।
आकाश से एक घंटे की मुलाकात के बाद वापस आते हुए, हर्षवर्धन की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया और ऑन द स्पॉट उन्होंने दम तोड़ दिया ।
बंगले पर जब यह खबर पहुंची तो सब एकदम सकते में आ गए । सृष्टि का तो बुरा हाल हो गया और वह बेहोश हो गई । हिमांशु ने आकाश को भी खबर कर दी ।
तीन दिन हो गए थे हर्षवर्धन को गुजरे हुए । उसके सारे अंत्येष्टि के कार्य पूरे कर दिए गए थे । अब धीरे-धीरे लोगों का आना भी कम होने लगा । लेकिन सृष्टि इस सदमे से उबर नहीं पा रही थी, उसने कई दिन से कुछ खाया भी नहीं था ।
एक डॉक्टर हमेशा उसके पास रहता, जैसे ही उसे होश आता, वह जोर - जोर से रोने लगती । डॉक्टर को उसे इंजेक्शन देना पड़ता जिससे वह सो जाती । यश, आकाश, हिमांशु, हमेशा उसके पास रहते । इसी तरह एक महीना हो गया पर सृष्टि की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ ।
उसे मनोचिकित्सक को भी दिखाया गया ।
मनोचिकित्सक : इन्हें सदमा लगा है, जो वक्त के साथ ठीक भी हो सकता है और बढ़ भी सकता है । मेरी राय में, आप इन्हें कहीं बाहर ले जाएं और किसी बात की कमी महसूस ना होने दें ।
यश के सामने अब समस्या यह थी कि क्या किया जाए । वे बिजनेस पर ध्यान दें कि सृष्टि की देखभाल करें । उनकी नजर में हिमांशु इस जिम्मेदारी को ठीक से नहीं संभाल सकता था ।
उसी शाम वे दोनों जासूस, जो हर्षवर्धन के कहने पर आकाश की जासूसी कर रहे थे, आए । उन्होंने बताया कि उनकी अभी आधी पेमेंट बची है,जो हर्षवर्धन को उन्हें देनी थी । उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने क्या काम किया था । यह सुनकर यशवर्धन ने सोचा की भाई साहब आकाश की जासूसी इसीलिए करवा रहे थे ताकि आकाश के बारे में अच्छी तरह से जान कर वे सृष्टि की शादी उससे कर दें । अब यह काम मुझे करना चाहिए । उन्होंने हिमांशु से राय ली । उसे भी यही ठीक लगा । हिमांशु ने आकाश से बात की ।
आकाश : यदि ऐसा करने से सृष्टि ठीक हो जाती है तो मुझे कोई एतराज नहीं । मैं सृष्टि से शादी करने को तैयार हूं ।
सृष्टि को भी जैसे - तैसे बताया गया । वह रोने लगी, उसने कोई जवाब नहीं दिया ।
यश : तुम्हारे पापा भी यही चाहते थे । आकाश, शादी के बाद तुम दोनों कुछ समय के लिए बाहर चले जाना । यहां से दूर होकर शायद सृष्टि थोड़ा संभल जाए ।
आखिरकार बहुत ही सादा ढंग से सृष्टि और आकाश की शादी हो गई । दोनों दार्जिलिंग चले गए जहां सृष्टि का बंगला था ।
सृष्टि के चले जाने के बाद घर बिल्कुल खाली हो गया । यश और हिमांशु हॉल में बैठे हुए थे ।
यश : हिमांशु, अब तुम्हें अपनी आदतें बदलनी होंगी । बिजनेस पर ध्यान दो, मैं अकेला यह सब नहीं संभाल
सकता ।
आज पहली बार हिमांशु को अपने पापा से हमदर्दी हुई । उसने हामी भर दी, पर वह उदास था कि उसके पापा ने उसके प्यार से उसे जुदा किया । यशवर्धन समझ गए कि हिमांशु क्या सोच रहा है, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा ।
यश अपने भाई हर्षवर्धन के कमरे में आया । आज वह बहुत समय बाद इस कमरे में आया था । वह हर चीज को देख रहा था । फिर हर्षवर्धन की कुर्सी पर बैठ गया, तभी सामने उसे एक डायरी नजर आई, जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी । उसने उत्सुकता से उसे उठा लिया और पढ़ने लगा । जैसे - जैसे वह पढ़ता जा रहा था उसकी आंखें विस्मय से चौड़ी होती जा रही थी । आखिरी पेज पढ़ कर तो वह एकदम घबरा गया और हिमांशु के कमरे की तरफ भागा ।
क्रमशः
धनु दयाल

0 टिप्पणियाँ