कितने  ही  भक्त हैं प्रभु   तेरे,
पार्षद और  वंदीजन   कितने ।
प्रह्लाद,    नारद ,  पाराशर  से,
पुंडरीक ,व्यास,शुक ,शौनक से।।

अंबरीष, भीष्म,  रुक्मांगद  .से,
अर्जुन वशिष्ठ और विभीषण हैं।
इन  सब  भक्तजनों  के  सामने ,
द्वार    तेरे     गुमनाम  हूँ    मैं।।

दो भक्ति  अंबरीष रुक्मांगद सा,
प्रह्लाद ,नारद   व  पुंडरीक  सा।
ज्ञान दो मुझे भीष्म ,वशिष्ठ  सा,
पराशर,व्यास,शुक शौनक सा।।

साख्य दो मुझे तुम अर्जुन सा,
दास्य  दो  मुझे विभीषण सा।
परम   भागवत  उनके  जैसा,
मुझे   बनाओ   पार्षद   वैसा।।

करूँ  गान  मैं  नारद   जैसा,
नाम  जपूँ  प्रह्लाद  के जैसा।
करूँ मित्रता अर्जुन  के जैसा,
करूँ वंदना विभीषण  जैसा।।

नाम  मेरा  हो  मैं  न   चाहूँ ,
उन  परम भागवत लोगों में।
गुमनाम  ही  सही  पड़ा रहूँ ,
सदा  तुम्हारे  ही  चरणों में।।

-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "