बहुत बेगाने हो गए तुम,
इतना कैसे बदल गए तुम!
लगाकर शब्दों की झड़ी,
करके मुझे बेजार!!
खामोश हो गए तुम!!
अब न लिख पाऊँगी,
कोई तहरीर तेरे लिए!
माफ करना, पर जिसका,
हृदय से वास्ता ना हो,
वो पाषाण बन गए हो तुम!!
अब तो मेरी कलम भी,
तुझे लिखना भूलने लगी!!
खामोशी ओढ़ चुकी है ये,
लगता है जैसे सच में,
गुमनाम हो गए हो तुम!!
श्वेता कर्ण

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