इतनी कम आयु में इतना ज्ञान किसे हो सकता है। धर्म के सारे तत्वों का एकदम ठीक विश्लेषण भला कौन कर सकता है। बताते हैं कि शंकराचार्य जी ने भी बहुत कम आयु में अपने ज्ञान का झंडा गाङ दिया था। विवेकानंद जी भी बहुत कम आयु में पूरी दुनिया में विख्यात हो गये थे। स्वामी नरेशनाथ भी ऐसे ही अनोखे व्यक्तित्व हो गये। उनकी अनेकों पुस्तकें छ्प चुकी थीं। अनेकों धार्मिक आयोजनों में वह बुलाये जाते।
महर्षि कृपादास को याद है कि बहुत साल पूर्व एक पंद्रह या सोलह वर्ष का बालक उनके आश्रम में आया था। स्वामी जी के चरणों में गिर गया। दुनिया से सताया और माता पिता रहित बालक पर उनको सहज दया आ गयी। पर क्या बच्चे को अपनी शरण में रखना ठीक रहेगा। मन को जीतना इतना कहाॅ आसान है। केवल गेरुआ वस्त्र पहन लेना ही सन्यास नहीं है। सन्यास है मन को जीतना। जो इतना आसान नहीं है। फिर भी शरण आये एक अनाथ बच्चे को शरण न देना भी महापाप है।
" तुम्हारा नाम क्या है। बच्चे।"
" मैं पिछला सब भूल चुका हूं। अपना नाम भी।"
बालक की बात यदि सत्य थी तो यह सन्यास के आरंभ का संकेत थी। फिर अनेकों वर्षों में कोई ऐसा वीत रागी पैदा होता है। फिर भी गुरु ने विभिन्न तरीकों से उसकी परीक्षा ली। वर्षों बाद निश्चित कर लिया कि यह बालक एक अनमोल धरोहर है। अज्ञान को मिटाने के लिये एक सूर्य देव का अवतरण हुआ है।
बसंत पंचमी का ही दिन था। गुरु कृपादास ने बालक को विधि विधान से अपना शिष्य बना लिया। सन्यास धर्म की शिक्षा दी।
". एक बार फिर सोच लो बालक। यह आसान पथ नहीं है। यदि पिछले जीवन की कुछ भी इच्छा शेष हो तो इस पथ पर मत चलना। मिट्टी और स्वर्ण को एक सा विचार करना आसान नहीं है। और उससे भी बङी बात, विश्व की सभी स्त्रियों से माता, बहन या पुत्री सा व्यवहार रखना। सन्यास के बाद तुलसीदास ने भी अपनी पत्नी रत्नाबाई को माॅ ही समझा था। यह पथ इतना सहज नहीं है। इसलिये फिर से सोच लो। "
" जी गुरुदेव। मैं पुरानी किसी बात को याद नहीं करूंगा।बचन देता हू कि सभी स्त्रियां मेरी माॅ के समान होंगीं। धन और वेभव की तरफ मैं देखूंगा भी नहीं। "
उसी दिन उसका नामकरण नरेशनाथ हो गया। गुरु को कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। गुरु का प्रेम भी शिष्य पर उमङा। शिष्य को अनेकों धर्म ग्रंथों का ज्ञान दिया। कुछ तो यह भी कहते हैं कि गुरु कृपादास ने नरेशनाथ को ऐसी अनोखी विद्याएं भी सिखायी हैं । इन बातों में कितना सत्य है, कहा नहीं जा सकता। पर इतना जरूर सत्य है कि स्वामी नरेशनाथ जैसा ज्ञानी युगों में अवतरित होता है।
पूरी पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान है जो पृथ्वी से अलग है। सुनते ही हॅसने का मन कर रहा होगा। पर वास्तव में पवित्र काशी नगरी पृथ्वी से अलग मानी जाती है। महाराज हरिश्चंद्र का पूरे विश्व में राज्य था। वह अपना राज्य विश्वामित्र जी को दान कर भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी काशी नगरी में ही रहे थे ।
आज फिर बसंत पंचमी का दिन था। गुरु कृपादास से दीक्षा पाये आज नरेशनाथ को पूरे बीस वर्ष हो चुके थे। भगवान आशुतोष की कृपा पाने के लिये संतों की टुकङी आज वाराणसी आयी है। पवित्र गंगा नदी में स्नान कर बाजार से गुजर रहे थे कि नरेशनाथ रुक गया। एक गली के भीतर एक घर की खिङकी पर थोङी देर नजर लगायी। फिर आगे बढ लिया। वैसे यह कोई बङी बात न थी। पर गुरु को लगा कि कोई बङी बात है।
अगले ही दिन गुरु कृपादास ने नरेशनाथ को आश्रम से निकाल दिया। यह खबर चारों तरफ फैल गयी। अखबारों के कई पत्रकार दोनों के कई दिन पीछे घूमे। पर गुरु का हमेशा उत्तर था कि अभी वह सन्यास का अधिकारी नहीं है। शिष्य भी यही बोल देता कि अभी मैं सन्यास का अधिकारी नहीं हूं। फिर कुछ दिनों बाद नरेशनाथ की खबरें अखबारों में आनी बंद हो गयीं।
इसी बीच दूसरे अनेकों अखाङे के संत नरेशनाथ के पास आये। आखिर इतने विद्वान युवक के साथ होने से अखाङे का भला होता है। पर नरेशनाथ किसी ने सभी को हाथ जोड़ मना कर दिया।
" महोदय। मेरे गुरु की मुझपर असीम कृपा है। उनका कहना सत्य है कि अभी मैं सन्यास के योग्य नहीं हूं। फिर इससे क्या फर्क पङता है कि आप मुझे खुद के अखाङे में शामिल करना चाहते हैं। अभी मुझे क्षमा करें। सन्यास के लिये पात्र बनकर ही फिर इस मार्ग पर आऊंगा।"
फिर नरेशनाथ ने अपने गेरुआ वस्त्र उतार दिये। आज लगभग छत्तीस वर्ष की आयु पर वह संसार में बहुत समय पूर्व किसी को दिया वचन निभाने उतर रहा था। हालांकि नरेशनाथ को अभी भी यह पता नहीं था कि वह खिङकी के पार जिस लङकी को इंतजार करने की बोलकर निकला था, वह आज भी उसका इंतजार कर रही है या फिर वह अपनी राह पकङ चुकी है । पर यह सत्य है कि अभी तक वह संसार की प्रत्येक स्त्री को माता नहीं मान पाया है।आज भी वह लङकी उसके स्वप्नों में आती है। अपने इंतजार का हवाला देती है। गुरु जी के अनुसार अभी उसका कुछ कार्य संसार में शेष है। जिसे पूरा किये बिना सन्यास पथ पर नहीं बढ सकते।
नरेशनाथ आज अनेकों वर्षों बाद सन्यास समर में उतरा है। भले ही सन्यासी के रूप में उन्हें ज्ञान का भंडार कहा जाता रहा है। पर उसका वह ज्ञान का भंडार शायद ही उसकी जीवन यात्रा को आगे चला पाये। एक डिग्री हीन युवक का ज्ञान अब बेकार था। फिर भी बिना परवाह किये वह ईश्वर को याद कर आगे बढ लिया। ईश्वर पर पूर्ण आश्रय ही सन्यास का आरंभ और अंत होता है। तो इस तरह से गेरुए वस्त्र त्याग कर भी नरेशनाथ आज भी सन्यासी ही है।
क्रमशः अगले भाग में...
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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