गतांक से आगे...
एक दिन अनिल जी के दोस्त का बेटा राजीव अपनी पत्नी माला के साथ अनिल जी के घर आया। बातों-बातों में उन्हें सुधा की पूरी कहानी पता चली। तब माला ने वसुधा जी को समझाया कि, इसमें सुधा की क्या गलती है?
वो क्यों किसी से बात नहीं करती?
आखिर उसकी गलती क्या है? इस तरह की बातें समझाने पर, कुछ दिनों के बाद से सुधा अपनी आगे की पढाई में जुट गई और एक निजी विद्यालय में पढाने भी लगी।
इधर सुधा के भाई की नौकरी भी लग गयी और वह भी दूसरे शहर में रहने चला गया जहाँ उसकी नौकरी लगी थी।
दिन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ते जा रहे थे।
अब सुधा की छोटी बहन भी विवाह योग्य हो गई थी और उसके लिए भी रिश्तें खोजने की बातें होने लगी थी।
...एक दिन अनिल जी ने फोन करके राजीव को घर आने के लिए कहा।
दूसरे दिन शाम को राजीव अनिल जी से मिलने उसके घर गया। बातों ही बातों में अनिल जी ने बताया कि छोटी बेटी प्रीति की शादी की बात कहीं भी करता हूँ तो, सुधा के बारे में लोग पूछने लगते हैं और फिर बातों का रुख ही बदल जाता है, ऐसी स्थिति में क्या किया जाए?
सुधा जो कि उन लोगों के लिए चाय लेकर आ रही थी, उसने उन दोनों की बातें सुन ली और सामने आ कर कहा
सुधा- "पिता जी, जब तक प्रीति की शादी कहीं ठीक नहीं हो जाती है। मैं अपने ससुराल चली जाऊँगी।"
अनिल जी- "लेकिन सुधा, वहाँ तुम्हारा कौन है? जो तुम वहाँ जाना चाहती हो। तुम्हारे ऐसा करने से क्या होगा?"
लेकिन सुधा अपनी बातों पर अड़ गई और दूसरे ही दिन
अपने देवर सागर को आने को कहा और उसके साथ
अपने ससुराल चली गई। शादी के सात साल बाद फिर वापस अपने ससुराल आना उसे अटपटा लग रहा था लेकिन अपनी छोटी बहन के अच्छे भविष्य के लिए यह कदम उठाया था!
ससुराल में सुधा को देख कर उसके सास-ससुर बहुत खुश हुए। सुधा ने उनके पैर छुए, उन्होंने भी सुधा को ढेरों आशीष दिया।
सुधा अपने सास-ससुर की अच्छे से सेवा कर रही थी, सभी उससे बहुत खुश थे, लेकिन दोनों ही कौशिक के कारण आत्मग्लानि से भरे हुए थे और सुधा से माफी माँगते रहते थे। सुधा अपने ससुराल में तीन महिने रही।
घर के लोगों से कौशिक को भी इस बात की जानकारी मिल चुकी थी लेकिन कौशिक एक दिन के लिए भी नहीं आया।
इधर सुधा की बहन प्रीति का रिश्ता भी तय हो गया। प्रीति का होने वाला पति, सरकारी नौकरी में बहुत ऊँचे पद पर था।
पढ़े लिखे लोग, अच्छे पैसे वाले और क्या चाहिए।
सुधा के बारे में जानकर भी उन लोगों ने कुछ भी गलत नहीं कहा। घर के सभी लोग खुश थे। सुधा को भी फोन करके सारी जानकारी दे दी गई थी।
सुधा कुछ दिन ससुराल में रुक कर वापस अपने मायके आ गई।
प्रीति की शादी पक्की हो गई, यह सुनकर वह बहुत खुश थी।
एक दिन अनिल जी सुधा को पास बुलाकर, बोले,
"सुधा, तुम जिद करके अपने ससुराल चली गई लेकिन कौशिक एक दिन के लिए भी नहीं आया! बताओ बेटी उसके नाम के सहारे इतनी लंबी उम्र कैसे गुजार पाओगी? प्रीति की शादी होते ही कोई अच्छा लड़का देख कर तुम्हारी भी शादी कर दूँगा। बस उस कौशिक को भूल जाओ...।"
क्रमशः
श्वेता कर्ण

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