गतांक से आगे.......
... तब पिता की बात सुनकर सुधा कहती है कि मुझे दूसरी शादी नहीं करनी है।
फिर बात आई-गई हो गई।
घर में प्रीति की शादी की तैयारियाँ होने लगी।
देखते ही देखते शादी का दिन भी नजदीक आ गया।
अनिल जी ने अपनी हैसियत से बढ़ कर प्रीति के ससुराल वालों को दहेज के रुप में रुपये-पैसे, गहने और बाकी का सारा भी दिय।
प्रीति की शादी बहुत धूमधाम से संपन्न हो गयी और
प्रीति अपने ससुराल चली गई।
घर में अब तीन लोग ही रह गए थे...
और सुधा भी सुचारु रूप से फिर से विद्यालय जाने लगी। एक दिन एक शादी समारोह में अनिल जी की मुलाकात राकेश नाम के व्यक्ति से होती है।
बातों ही बातों में पता चलता है कि राकेश की पत्नी को गुजरे दो साल हो गए हैं और राकेश अपने लिए एक लड़की की तलाश में हैं जो घर और बच्चों को अच्छे से सम्हाल सके।
क्योंकि राकेश के दो बेटियाँ है, जिसकी उम्र सात साल और ढाई साल है।
अनिल जी ने उन्हें सुधा के विषय में बताया।
फिर राकेश ने पुछा कि सुधा की शादी हुई कहाँ थी? तब अनिल जी ने सुधा के ससुराल और ससुर जी का नाम बताया।
तब राकेश ने बताया कि मेरा भी ससुराल उसी गाँव में है और मेरी पत्नी का नाम मीरा था।
काफी देर बात करने के पश्चात, अनिल जी ने राकेश जी को कहा मैं घर के अन्य सदस्यों से बात करने के बाद इस विषय में आपको जल्द ही अवगत करा दूँगा।
घर आ कर अनिल जी ने वसुधा जी, सुधा, अपने बेटे और प्रीति से भी इस बात की चर्चा की।
सुधा ने शादी करने से मना कर दिया।
लेकिन सब के समझाने के बाद वह राजी हो गई।
राकेश को फोन करके अनिल जी ने सुधा की सहमति से अवगत कराया और उन्हें भी अपने घर में बात करने को कहा।
कुछ दिन बाद दोनों परिवारों की आपसी सहमति से सुधा और राकेश की शादी एक मंदिर में सम्पन्न कर दी गई और सुधा अपने ससुराल चली गई।
"ये कैसा संयोग हुआ!"
ससुराल जा कर सुधा ने राकेश की दोनों बेटियों को अपना लिया और घर में सबको खुश कर दिया।
एक दिन माला वसुधा जी से मिलने आई तो बोली, "चाची आप और चाचा जी खुश रहा करें।
अब तो दोनों बेटियों का घर बस गया है और अब जल्द ही घर में बहू भी ले आइये।"
इधर-उधर की बातें करके माला भी अपने घर चली गई।
एक दिन अचानक राजीव ने माला को बताया कि प्रीति आई थी सुना है बहुत बीमार थी, पता नहीं क्या हुआ था उसे?
चाचा जी मिले थे वही बता रहे थे।
डॉक्टर से इलाज कराने के बाद फिर अपने ससुराल चली गई।
वो लोग प्रीति को यहाँ अधिक दिन रहने ही नहीं देते हैं।
माला ने कहा - "ये तो बहुत अच्छी बात है, बेटी जितना अपने घर में रहे उतना अच्छा होता है।"
कुछ दिनों के बाद अनिल जी ने अपने बेटे का विवाह भी कर दिया।
अब दोनों पति-पत्नी बहुत खुश थे।
चलिए दुख के दिन दूर हुए। घर में बहू आ गई। अब सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगीं।
लेकिन वसुधा और अनिल जी के जीवन में दुःखों का अंत शायद अभी नहीं हुआ था।
एक दिन अचानक सुबह-सुबह अखबार में एक खबर पढ़ कर राजीव अवाक रह गया क्योंकि वो खबर प्रीति के बारें में थी...
क्रमशः........
श्वेता कर्ण

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